तुम आ जाओ, प्रभु
ठहरी, पर अशांत,क्रांत-क्रांत… !समय का पल-पल आँख से गुज़रता…मन को धकियाता-साकुरेदता और उग्र करता…पर बेबस मैं…कौन मैं?!मन नहीं।आत्मा नहीं।देह नहीं।फिर कौन?!कौन आभास पाता है, मन की उग्रता का?कौन ग्राह्य करता …
ठहरी, पर अशांत,क्रांत-क्रांत… !समय का पल-पल आँख से गुज़रता…मन को धकियाता-साकुरेदता और उग्र करता…पर बेबस मैं…कौन मैं?!मन नहीं।आत्मा नहीं।देह नहीं।फिर कौन?!कौन आभास पाता है, मन की उग्रता का?कौन ग्राह्य करता …
एक रात बिस्तर में डूब जाती है, आँख दिन भर में ऊब जाती है,खाब देखें तो किसके देखें, दुनिया बेनूर ही नज़र आती है।इस जमाने को तू चलाता है खुदा,मेरे …
एक वेदना है, जो व्यक्त होना चाहती है,पर रह जाती है, अव्यक्त।कई कारण हो सकते हैं उसकेअव्यक्त रह जाने के-व्यक्त कर पाने की कला का अभाव,व्यक्त करने से संभावित संकट …