आध्यात्म व दर्शन
मैं कहाँ और ये कहाँ
प्रेम के गणित में उलझे हुए तुम, फायदे की बात ही करते रहे।फूल प्लास्टिक के लगाए फिर रहे हो, चीखते हो खुशबूएँ गुम हो गई हैं।तुमने बस अक्सों में ही …
…सिर्फ होने के लिए!
देह में चुभते-चुभते,तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई…या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं……सिर्फ होने के लिए… !! ०९०३२४/०९०३२४





