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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

अधूरा साथ

सीपियों ने बिताई है तमाम उम्र शंख के साथ,शंख की ध्वनि का उन्हे, अनुमान पर नहीं।लहरों ने कब छोड़ा है समंदर का साथ?उसकी गहराई का उन्हें, अंदाज़ पर नहीं।आईनों ने …

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देह-प्रेम

तुम भवन के साथ भँवरे हो जाते हो।ईंट, गारा, रेत, मिट्टी से बना;चमकदार और चटकदार रंगों से लिपटा!तुम अक्स देख कितने मोहित हो!तनिक इधर से, तनिक उधर से-तराशने में कितने …

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मैं कहाँ और ये कहाँ

प्रेम के गणित में उलझे हुए तुम, फायदे की बात ही करते रहे।फूल प्लास्टिक के लगाए फिर रहे हो, चीखते हो खुशबूएँ गुम हो गई हैं।तुमने बस अक्सों में ही …

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…सिर्फ होने के लिए!

देह में चुभते-चुभते,तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई…या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं……सिर्फ होने के लिए… !! ०९०३२४/०९०३२४