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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

पर हम रीते…

फिर दिन बीता,फिर रात गई,कल सुबह हुईऔर कल बीता।कल का फिर अगला कल बीता।फिर माह गए, फिर बरस गए,फिर दशक-शतों का युग बीता,फिर युग बीते… पर हम रीते। ०५०८१७/०५०८१७

अकेला

ये कहाँ मालूम था मुझकोकि इतना, मैं अकेला आजखुद से भी विलग रह कर जिऊँगा!वृहद दुनिया की असीमित भीड़ में भी,एक भी ना कोई जिससेइस हृदय को कह सकूँगा!ये तो …

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संवेदना

संवेदना को हे कवि! तुम क्षुद्रतम-सा जान बैठे,वेदना की टीस का उपचार हेतु मान बैठे।तू दुखी जब-जब हुआ, धड़क मेरी भी पिराई,अनुभव किया,संवेदना दिखलाई-कभी ना ही दिखाई,रीत भर तुम मान …

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चुनाव

इन्द्र-धनुष के सात रंग-जामुनी भी, पीला भी !तुम्हें पीला पसंद हो सकता हैऔर जामुनी ना-पसंद !अस्तित्व की रचना सतरंगीऔर सुन्दर है,तुम चुनने की भूल में उलझे हो.. । ०९०३२२/०९०३२२