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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

हर वक़्त मैं जवाँ हूँ

था रंग जवानी का औ’ रोशन थी ज़िंदगी,हासिल थी हरिक शै, ना गुलामी ना बंदगी।हर यार कह रहा था, मुकद्दर कमाल है,परवाज़ है फ़लक पे औ’ हासिल है बुलंदी।हर वक़्त …

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रविरस

अल सुबह से प्रेम तुमसे हो गया था, शाम को उस ओर जाकर छिप गए तुम; रात को प्रतिबिंब अपना भेजकर, निश्चिंत कितने थे- दिखा अगली सुबह को!राह तेरी कुछ …

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…शांति ही बस चाहता हूँ

शांत, निस्पृह, मंद…. न कोई हलचल,न ध्वनि कहीं से।न आवेग कोई, न उग्रता का तनिक अंश ही। तूफान का कुछ नाम तक दिखता नहीं…। क्या जल ही सारा तलहटी में …

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प्रेम

“प्रेम, तुम्हारे द्वार ये कोपलें कैसे खिली हैं?क्या सुवासित पुष्पों के इस भ्रूण-रूप कोद्वार कोई और नहीं दीख पड़ता?!””ये अन्तर की कोपलें है-ए राहगीर,दिव्य इनकी महक औरईश इनका स्वरूप है।कोमलता …

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