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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

जीने की ज़िद

मुझे जीने की ज़िद चाहिये।मैं अस्वीकार करता हूँ मृत्यु के हर पहर को-वरण कर उसके ही जीव-स्वरूप को!मैं असाधारण नहीं, अति-साधारण होना चाहता हूँ,कि समा सकूँ गौरेया के नन्हे-से घोसले …

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राह से संवाद- १

गंतव्य जब कहीं दूर-दूर भी नज़र नहीं आता, तब भटका सा अनुभव करता है जीवन की राह पर चलता राही…! और फिर उसी राह से प्रश्न करता है जिस पर …

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तृष्णा तो शान्त हुई!

तृप्ति…!क्या छिपी है अकूट धन संपदा और उसके आडंबर में या मिल जाती है किसी कोमल हृदय के स्पर्श मात्र से…! था किवाड़ खुल रहा,खुल रहा चूँ-चूँ कर,हल्के से धक्के …

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