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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

… और तभी से ये ‘तट’ होगा 

ज़िंदगी के तमाम थपेड़ों से जूझते कब विदा हो जाता है प्रेम इस जीवन से, ख्याल ही नहीं रहता…। जब तलक समझ आता है, शून्यता गहन हो जाती है। फिर …

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निशा-सार

सुख और दुख, सही और गलत, रोशनी और अंधेरा… जीवन दो विपरीतताओं के संगम से ही पूर्ण होता है। वस्तुतः ये विपरीतताएँ – विपरीतताएँ नहीं बल्कि एक दूसरे की पूरक …

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मेरे प्यारे गुरु

एक असीम करुणा का नाम है गुरु…! जो स्वयं को मिला वो पूर्ण है, तत्क्षण मोक्षकारक…! किंतु मोक्षपूर्व ज्ञान प्रदान करने की एकमेव चाह…! असीम नमन और वंदन…! मैं भागता हूँ बार-बार,और तुम …

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