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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

प्रेमाश्रु

मैं रोया-और बिखरे ढेर-से आँसू,-उस रोने से!उसने समेट लिए वह आँसू,पवित्र मोती-से! वो रोई-और बिखरा ढेर-सा प्रेम-उस रोने से!उसने समेट लिया वह प्रेम,पवित्र धागे-सा!हम मिले-और बन गई एक पवित्र माला,उन …

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लट्टू

सब लट्टू डिस्चार्ज हो रहे, भरा माल निकले है,तू भी लट्टू, वो भी लट्टू,सब लट्टू भिड़ते हैं!लट्टू तो बाहर बाहर का,भीतर शुद्ध बसाए,सच्चा तू और सच्चा वो भी,भेद सभी मिट …

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किन राहों को खोज रहे हैं!

लंबे-लंबे रस्ते चलते-कभी घिसटते, कभी उछलते,कभी कहीं बस थम जाते हम।ऐसे ही अनगिनत रास्ते, हमसे होकर निकल गए हैं,हम भी इनकी सिर रीढ़ों पर,मचल-मचल कर फिसल गए हैं।क्या मंज़िल ये …

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प्रज्ञा निवेदन

और प्रज्ञा जग उठी और बोलती-“एक प्रतिवासी का घर है,एक घर खुद का यहाँ,एक घर परमात्मा का,बस यही ब्रह्मांड है!””तुमने प्रतिवासी के घर को,खुद का घर समझा हुआ है।”भ्रांति तुमको …

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