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आध्यात्म व दर्शन - अनहद की कलम से

ध्यान और जाम

बहुत हो गया ध्यान चलो, कुछ देर होश खो देते हैं,बेसुध-से चलते यारों,कुछ देर तनिक सो लेते हैं।——————कुछ देर नशे में रहने दे,कुछ देर बहकने दे मुझको, कुछ देर शराबी …

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राग और विराग

ये क्या है, हमसफ़र होनाऔर फिर दूर हो जाना, मिलना और राही से,राह का फिर बदल जाना।लगता यूँ कि जीवन भर,रास्ते एक ही होंगे, मगर मोड़ों पे, रस्तों सेमुड़कर दूर …

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धुआँ-धुआँ हर साँस

न जाने ये कैसी बेचैनी है, न जाने क्या सुलगता-सा है-देह के भीतर… हर लम्हा।धुआँ-धुआँ-सा हर साँस से बाहर-और हर साँस और भी सुलगता जाता!बेबस हूँ- बावजूद हर शै के।गहराती …

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मौत का वक़्त से रिश्ता

सब कुछ श्रेष्ठ प्राप्य है मुझको- धन, वैभव, संबंधी!तृप्त-पूर्ण हूँ घर-वाहन से, हर सुविधा सम्पन्न,माँ, भार्या, सुत, भाई-बहन से,तृप्त सभी संबंध। मित्र वर्ग- मैं भाग्यावान हूँ,साथ निवासी सत्‌जन, कर्मक्षेत्र सहयोगी …

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