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विचार मंथन - अनहद की कलम से

मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग २ (१९८९)

१२ अप्रेल १९८९”स्वयं अति-थी अपने नाम की तरह।”तूफाँ था वो आया हुआ,याद करता हूँ आज मैं,प्रेम किया था मैंने,जीवन में किसी से।देखा था मैंने तुमको,इक रोज़ जहाँ पर,आता हूँ देख …

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मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग १ (१९८६)

ज़िंदगी अब उबाऊ हो चली है,इस वीरान दिल में किसी के लिए जगहन बच सकी है अभी;कहाँ हम मोहब्बतकिया करते थे कभी,अब यूँ है कि नफ़रत भी नहीं करते!——————–जी नहीं …

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कविता

कविता…मात्र एक कवि की स्व–अभिव्यक्ति या उसके पार भी कुछ और? यूँ अनुभव होता है कि एक कवि की अंगुलियों और कंठ से अभिव्यक्त होने के बहुत पहले ही एक …

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“माँ”- मेरी प्रथम गुरु

तिनका–तिनका जोड़ कर अपनी जिंदगी के हर लम्हे से, वो हमारे हिस्से का वक़्त बुनती है! कभी खामोशी से और कभी तेज़ आवाज़ से; कभी अपनी आंखों के महीन इशारे से …

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