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एक अजन्मे को पत्र
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चाँद, तुम और दूरी - अनहद की कलम से

चाँद, तुम और दूरी

एक- चाँद

पूनम के चंदा को देखा।
भीतर दौड़ा, पहनी चप्पल,
दौड़ के आकर बाहर देखा,
चाँद अमावस चला गया!

दो- तुम

तुमने दिखलाया मुझे चाँद 
अपनी अंगुली से,
फिर पकड़ कर वही अँगुली
मैं चल पड़ा
उसी चाँद को पाने।

बीच राह तुम खो गए कहाँ?
मैं डोलता हूँ-
कभी ढूँढ़ता हूँ वो अँगुली
कभी देखता हूँ, वो चाँद!

तीन- दूरी

कैसा गणित लगाऊँ?-
तुम कितने फर्लांग दूर हो,
कितनी ध्वनि मैं मापूँ?
कितने अंश चमक भीतर है,
सर्द-गर्म क्या मापूँ?!

एक बिंदु मैं, एक बिंदु तुम
किंतु रेख बढ़ जाए;
सीध, वक्र के चक्र बन गए,
कोण कहाँ मैं नापूँ?

२००१०८/२००१०८