एक
रात बिस्तर में डूब जाती है,
आँख दिन भर में ऊब जाती है,
खाब देखें तो किसके देखें,
दुनिया बेनूर ही नज़र आती है।
इस जमाने को तू चलाता है खुदा,
मेरे मन को हटा, कर दे तू जुदा…!
दो
भीतर के इस शून्य-शून्य का,
बाहर के इस शून्य-शून्य से,
कब कैसे तुम विलय करोगे?!
तीन
और तुम्हारे जग को आखिर
किन आँखों से देखूँ...!
ये मन का संग्राम बड़ा है,
ये भ्रम का प्रासाद खड़ा है;
लड़-लड़ कर मन के सैनिक से,
प्रासदांत कब देखूँ!
और तुम्हारे जग को आखिर
किन आँखों से देखूँ...!
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