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दौड़ थमने–सी लगी है - अनहद की कलम से

दौड़ थमने–सी लगी है

दौड़ थमने–सी लगी है,
खोज बढ़ने–सी लगी है,
रौनकें बाज़ार पहुंची आसमाँ--
पर चाह घटने–सी लगी है।

जिनकी ख्वाहिश थी,
कभी सपने बुने थे,
जिनको पाने को,
अजब रस्ते चुने थे।
रास्ते वो दौड़ के,
हाथ कितने छोड़ के,
छू लिए कितने शिखर,
जो अनछुए थे।

साँझ मीनारों पे,
चढ़ने–सी लगी है,
दौड़ थमने–सी लगी है।

ख्वाहिशें पूरी हुईं--
सपने अधूरे,
जी लिए सपने--
नयी चाहत को ढूँढ़े,
चाह–स्वप्न चक्र में,
घूमता विचित्र मैं,
दृश्य वो ही सामने
आँखों में घूमे।

आँख, यूँ लगता है,
खुलने–सी लगी है
दौड़ थमने–सी लगी है।

मंज़िलें मिलकर
कहीं गुम हो गईं,
फिर नज़र आईं,
मगर फिर खो गईं,
मंज़िलों को खोजते,
रास्तों पर दौड़ते,
असलियत मंज़िल की
ज़ाहिर हो गई।

रास्तों की भ्रांति
दिखने–सी लगी है,
दौड़ थमने–सी लगी है।

२५१००४/२५१००४