न जाने ये कैसी बेचैनी है,
न जाने क्या सुलगता-सा है-
देह के भीतर... हर लम्हा।
धुआँ-धुआँ-सा हर साँस से बाहर-
और हर साँस और भी
सुलगता जाता!
बेबस हूँ- बावजूद हर शै के।
गहराती माथे की लकीरें-
हर रोज़... कुछ और!
आँख से सिर के हर तरफ
दर्द का कंटीला बिछौना-सा
बिछता जाता।
सब कुछ है, हे प्रभु!
और सब वक़्त पर होता भी जाता,
पर फिर भी क्यूँ हूँ इतना परेशान,
और ये हर साँस क्या सुलगता जाता?
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