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एक अजन्मे को पत्र
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ध्यान और जाम - अनहद की कलम से

ध्यान और जाम

बहुत हो गया ध्यान चलो, 
कुछ देर होश खो देते हैं,
बेसुध-से चलते यारों,
कुछ देर तनिक सो लेते हैं।
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कुछ देर नशे में रहने दे,
कुछ देर बहकने दे मुझको,
कुछ देर शराबी होने दे,
मदमस्त डोलने दे मुझको।

वो झोंके बरसो पहले के,
फिर जाम लगा कर पीने दे,
ये ध्यान-साधना खूब हुई,
कुछ हँसी-फव्वारे जीने दे।
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मैंने दोनो रस देख लिए,
ना दोनों में कुछ रस निकला,
नीरस जीवन, नीरस ही रहा,
या जाम पियो या ध्यान करो!

मदिरा तो फिर भी सच्ची है,
जो कहती है वो देती हैं,
पर ध्यान, प्रेम में है धोखा,
मँझधार में कश्ती रहती है।

साकी की जुबां तो पक्की है,
जो नशा कहा तो नशा दिया,
गुरु तो हर-पल शर्तें रखे,
कभी ज्ञान दिया, कभी भगा दिया।
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हलक पे उतरने से पहले,
जिगर में उतरती है,
ये शराब बड़ी बला है,
हर वक्त बहकती है।
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मौत करीब है,
जवानी की बात न कर,
जीली जो जी ली,
कुछ और की बात न कर।
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व्यर्थ हुआ सब समय हमारा,
जनम ये सारा खर्च हुआ,
क्यों हम उन राहों पर निकले,
चलकर जीवन व्यर्थ हुआ?!
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जिन राहों को फूल का समझा,
वो काँटो से सजी मिलीं,
जो छोड़ी वो राह न जाने,
फूल बिछे या काँटे थे?!
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वो खुशबू तो भरम भरी थी,
नकली गंधें महकाती,
असली खुशबू पता नहीं कुछ,
क्या सच में जीवन पाती!

२३१२२१/२३१२२१