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दो प्रतीक्षा के स्वर - अनहद की कलम से

दो प्रतीक्षा के स्वर

एक- कौन सी दिशा चलूँ?

एक विषम चक्र है,
घूमता विचित्र है!
डोलता सत् की दिशा, पर
दीखता असत्य है।

प्रेम, मोह गड्डमड्ड,
धुंध, स्याह हर तरफ,
कौन सी दिशा चलूँ,
या बैठना ही गत्य है?!

१७०९१८

दो- क्या वो है पहले ही?

"बाट जोहता हूँ; हर पल, हर क्षण-
उस के आने की।"

"किस की, जो है पहले ही?"

“सच…
है क्या वो है पहले ही?!
सच लगता तो है
पर अनुभव नहीं आता...!"

२३०९१८