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दो विलाप के स्वर - अनहद की कलम से

दो विलाप के स्वर

एक- पुकार

तुम कहाँ हो प्रभु! 
क्या मेरी पुकार इतनी मंद है
कि उसकी ध्वनि
तुम्हारे कानों तक पहुँचती नहीं?

क्या तुम इतने दूर हो प्रभु,
कि तुम्हारी विराट दृष्टि भी
मुझ पर पड़ती नहीं?
क्या सत्य ही तुम्हे
सुनाई नहीं पड़ता मेरा ये
कातर विलाप...
मेरी ये करुण पुकार?!

प्रभु ! क्या सत्य ही तुम्हे नहीं दीखता
मेरा यूँ लड़खड़ाता-सा चलना?
या कि प्रभु मैं ही हूँ किसी भ्रम में,
या कि स्वप्न में ही देखता हूँ
इस दृष्य को?!

दो- द्विविधा

प्रभु! जो मैं कर रहा हूँ
वो कर रहा हूँ तुम्हारे निर्देश पर,
या कि कर रहा हूँ,
अपने भय, आलस्य या
वासना के वशीभूत हो;
और 'तुम्हारा निर्देश' कह कर,
मढ़ देना चाहता हूँ तुम पर,
हर अनहोनी का दोष…!

१८१००३/१८१००३