ज़िंदगी दो विपरीतताओं के बीच
खड़ी दिखती है-
अस्त-व्यस्त-से शोर-गुल के बीच
एक गहरा, स्तब्ध-सा सन्नाटा-
जहाँ अचानक चलते-चलते
मैं थम जाता हूँ।
उस उथले शोर-गुल से गुज़रते,
थम जाता हूँ सुनने
उस निरंतर गहराते सन्नाटे की आवाज़।
एक उम्मीद-
उस आवाज़ को और गहराई से सुनने की
और कसक-
उसे ना सुन पाने की...
ज़िंदगी दो विपरीतताओं के बीच
खड़ी दिखती है।
१९१११२/१९१११२





