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एक अजन्मे को पत्र
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दोष–निर्दोष का विज्ञान - अनहद की कलम से

दोष–निर्दोष का विज्ञान

भाव निर्धारित करेगा,
दोष या निर्दोष है!

देख कर केवल क्रिया,
व्यवहार से मत तोलना,
वो तो दोलक का
पुराने बल से जैसे डोलना।
जैसे लट्टू घूमता है
शक्ति जितनी भी भरी,
और फिर आकार;
चिकनी हो सतह या खुरदरी।

मन की विकृतियाँ भी जैसे,
भाव से गति प्राप्त कर;
जितनी परतें, भार जितना,
उतना ही अनुनाद कर;
मन-पटल पर गूँजती
कब तक ध्वनि, निश्चित करें-
होश कितना धैर्य,
कितनी जागृति समभाव पर।

वेग संयोगों के भारी,
जागरण को ढाँपते,
भूल औरों की दिखे,
निर्दोष खुद को मापते।
कृत्य का रक्षण करें,
व्यवहार समुचित मानकर,
घूमते विषचक्र में,
जब तक नहीं सच जानते।

किंतु ना ग्लानि से भरते,
जो पृथक ये जानते;
भूल; “बुद्धि-चित्त की,
मेरी नहीं” पहचानते;
वो कदाचित्, शीघ्र अपने
होश को पाकर, विनत,
अहं से कहते कहो-
‘तुम भूल अपनी मानते’।

मन के दोषों को समझ,
अंतर से माफी माँग कर,
करें निश्चय- फिर ना हो व्यवहार-
शक्ति माँग कर;
प्रतिक्रमण- ये नित्य जो चलता रहे,
हर पल सजग,
दोष निज झरते रहें,
निर्दोष सब को जान कर।

नित्य ज्ञानी के वचन,
सत्संग, सेवा में रहें,
ज्ञान के साधक निरंतर,
बोध में बढ़ते रहे
“है व्यवस्थित सब”-
प्रतीति, जागृति, अनुभव बने,
और प्रज्ञा, बुद्धि-भ्रम को
भेद कर हाज़िर रहे!

ध्यान हो या ज्ञान हो,
या भक्ति में रमता रहे,
भाव, कर्ता का मिटे,
स्वीकार में समता रहे।
कार्य और व्यवहार में जो
भाव का विस्तार हो,
काम, क्रोध लुप्त हों,
और मान भी झरता रहे।

किंतु ज्यों सृष्टि नियम से,
वृक्ष धीरे बढ़ रहे,
और फिर धीरज को धर,
ऋतु-योग से वो फल रहे;
भाव भी यूं ही बढ़ें और,
फलित हो व्यवहार में,
रुत के आने तक मगर
धीरज से राहें तक रहे।

मन, वचन और देह की गति,
भाव-सी चलती नहीं,
भाव बदले, त्वरित किंतु,
मन-क्रिया बदली नहीं।
आज के भावों की शक्ति,
कल तलक फल पाएगी,
और तब ही आचरण में
भाव की गति आएगी।

जब तलक निश्चित नहीं,
ये शांति या विक्षोभ है;
मन, वचन, तन की क्रिया--
ये होश या बेहोश है।
आचरण और भाव में ना
जब तलक संयोग है--
‘भाव’ निर्धारित करेगा,
दोष या निर्दोष है!

२५०७०४/२५०७०८