जो रावण है, वही
राम बन जाता है हर काल
-ज़रा भीतर निहार कर।
एक छोर पर सत्य, चले
अलमस्त झूठ की चाल
-ज़रा इक द्वार लाँघ कर।
दिन का उजियारा, हो जाता
रात, बिना संवाद
-साँवली साँझ फाँद कर।
बुनती तारे-चाँद, रात
बन जाती सब आकाश
-भोर, सूरज को पाकर।
सुख की बगिया, आज
महकती खूब, चुभे कल शूल
-फूल के मुरझाने पर।
दुख तो सुख का यार,
एक डाली में झूमे साथ
-फूल, काँटों को पाकर।
सुख-दुख, दीन-कुबेर;
झूठ-सच हो या बैर-अबैर
-देखो हर कोण सजा कर।
ऐसा कोई राग, कि
जिसके साथ द्वेष का राग न हो
-तुम कहो ध्यान कर।
करे ज्योंही स्वीकार,
ये पूरक, नहीं भिन्न दो द्वार
-नदी में झलके सागर।
मन के होकर पार ही,
अनुभव में अद्वैत का सार
-द्वैत, अज्ञान जानकर।
वैभवमय संसार आज,
कल छूटे सारे द्वार
-ना व्याकुल गूढ़ जानकर।
निर्धन ही धनवान,
ना किंचित द्वन्द्व, भेद, तकरार
-सृष्टि का सत्य जानकर!
जनम-मृत्यु में भेद नहीं,
है चक्र सृष्टि निरपेक्ष
-जानते अनुभव पाकर!
पूर्ण-तत्व संसार, यही है
जीवन का आधार
-तृप्त हो दर्शन पाकर।
जो दानव है वही देवता,
भिन्न लगे जो वहीं एकता;
उलटबाँसी जो ज्ञान समाए,
जीवन सदा-सदा बदलाए।
ज्यों जीवन में दृष्टि बदलती,
आत्म-चेतना शक्ति छलकती;
बढ़े सजगता अनुभव फलता,
मिलन स्वयं से, प्रेम छलकता।
ज्यों-ज्यों मिलन प्रेम बढ़ जाता,
हृदय-द्वार खिलता खुल जाता;
प्रेम बढ़े और चूमे हारा,
सृष्टि-केंद्र हो झंकृत सारा।
सृष्टि-केंद्र तो अति बलशाली,
भरे देह में शक्ति भारी;
बूँद में जैसे सागर आए,
सृष्टि-ऊर्जा देह समाए।
इसी शक्ति का भेद जानकर,
यही शक्ति मन-देह साधकर;
वर्धमान, सिद्धार्थ औ’ शंकर,
बने बुद्ध, आदि, तीर्थंकर।
आखिर में सारांश ये करते,
कारण-समाधान बस कहते-
“‘या है राम, नहीं तो रावण’-
भ्रांति यही सुख-दुख का कारण;
कारण मिटते, द्वेत सिधारे,
जीवन में अद्वैत पधारे!”
तुमको, हमको श्रेष्ठ,
यही जो जीवन का उद्देश्य
-बढ़े हम ध्यान साधकर।
सुख-दुख से निर्लेप,
भाव में ना कोई विक्षेप
-नाभि पर श्वास नाद कर।
२५०६२५/२५०६२६





