ये जोर-जबर, ये छीन-झपट,
ये ठाँय-ठाँय, ये डाँट-डपट,
ये मार-धाड़, ये खींच-तान,
हल्ला-गुल्ला, षडयंत्र-कपट।
नवभोर हुई,
धरती का नव-शृंगार हुआ,
चहके पंछी,
नव-जीवन का संचार हुआ,
मृग-छौनों ने
नन्ही-नन्ही आँखें खोलीं,
उजला-उजला
देखो नव-संसार हुआ!
ये खून-खराबा, लूट-मार,
धक्कम-धक्का, ये चीर-फाड़,
ये दौड़-भाग, आपा-धापी,
टूटे-बिखरे, सब तार-तार।
पूरब की पवन बही,
वृक्षों में नृत्य बहा,
खग कलरव कर चहके,
सरिता में प्रेम बहा,
रवि किरणों ने चूमा,
बहती नद का माथा,
हर-दिश स्वर की सरगम,
सब जग मल्हार बहा।
ये रक्त-सक्त.......
-रक्तिम आभा का बिंब यहाँ....
ये कोलाहल ......
-जीवन ध्वनि का संगीत यहाँ......
ये अस्त-व्यस्त.......
-हर रितु का वैभव प्रगट यहाँ ...।
ये थका-थका,
-ये आनंदित,
ये बुझा-बुझा,
-ये दीप्तदीप
ये मुरझाया,
-अंकुरित बीज.....!
ध्यान, प्रार्थना,
सुमिरन के पथ-सुपथ साध कर;
ये थका-थका, ये बुझा-बुझा,
ये मुरझाया;
इस कोलाहल में.....,
ढूंढ़ सका संगीत, जलाकर
दीप, अंकुरित
बीज देख कर
झूमें इस आनंद-सगर में!
ये जोर-जबर, ये छीन-झपट,
ये ठाँय-ठाँय, ये डाँट-डपट;
ये सब भ्रम, भीतर भरे हुए!
ये शांत-शांत, ये प्रेमाहट,
ना द्वंद्व, ना कोई अकुलाहट,
हर काल-काल, हर दिशा-दिशा,
अंतर-अंतर, प्रभु रहे प्रकटा!
१९०३१९/१९०३१९





