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एक अजन्मे को पत्र
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द्वन्द्व से दर्शन की ओर: एक अंतर-यात्रा - अनहद की कलम से

द्वन्द्व से दर्शन की ओर: एक अंतर-यात्रा

"कौन हूँ मैं, क्या है सृष्टि?"
प्रश्न उद्वेलित किए थे।
"क्या यहाँ मेरा प्रयोजन,
यूँ ही या भटके हुए हैं?
बेरहम इतना ज़माना,
क्या खुदा सच में कहीं है?!"
"देख भीतर" चाँद बोला,
"सत्य के गुलशन खिले हैं।"

मैं सत्य देखना चाहता हूँ,
पर सत्य देख भागता हूँ,
और फिर कुछ दूर
किसी झूठी झाड़ी की ओट से,
चुपके-चुपके देखता हूँ- उस सत्य को
... अपने सत्य को...!!
अविश्वास-सा पूछता हूँ खुद ही से,
"क्या सच में ये ही सत्य है...
... मेरा अपना सत्य!"
यदि ये ही सत्य है--
तो कहाँ छुपा था ये सत्य
अनंत वर्षों से...?
मेरे भीतर ही तो नज़र आता है!
तो कहाँ दबा था ये सत्य
मेरी सीमित गहराई में...?!

मैंने तो माना था स्वयं को
-स्वच्छ और सरल…
... कुछ स्वाभाविक-से...
... थोड़े-बहुत...
... मानवीय और आवश्यक
... कुछ महीन से--
मैंले और वक्र चिन्हों के साथ!
किंतु, ये तो नज़र आता है
उस दृष्य के ठीक विपरीत…
... सब ओर कालिमा से आच्छादित,
व्रकता के महामार्गों पर गतिमान,
कुछ सांत्वना सी देती…
... बिन्दु-बिन्दु ... मानवीय या आवश्यक?
... लगभग अदृष्य-सी ही
श्वेत और सरल रेखाएँ!

देख कर ये चित्त काला,
आँखें मेरी खुल गईं;
बैठता स्तब्ध-सा--
ये क्या नज़र आया मुझे!
चाह क्या थी जानने की,
जो नज़र भीतर चली--
माँगता था गुल, मिला
काँटो का ये तोहफ़ा मुझे!

मैंने तो माँगा था सत्य सृष्टि का--
कि नज़र आता है मुझे,
कलुषित और कोलाहल से भरा--
मानकर कि नहीं हो सकता
यूँ ईश्वर का ये सृजन...!
मैंने तो मांगा था सृष्टि का वो सत्य...!

समझता था,
होगी मेरी दृष्टि का
प्रभु-नेत्र तक विस्तार,
और दिखेगा निष्कपट, अलौकिक,
सुंदर और संगीतमय संसार...
क्योंकि ऐसा ही तो हो सकता है
प्रभु का निर्माण!

किंतु यह क्या?!
बाहर के जिस कोलाहल से
स्वयं को मानता था अलग,
वो तो उपस्थित था भीतर ही--
संपूर्ण गर्जना के साथ!
बाहर के जिस कपट, जिस कलुष से
करता था घृणा,
वो तो विद्यमान थी
भीतरी ही-
अपनी संपूर्ण कालिमा के साथ।
बाहर की जिस दुर्गंध से,
बचता था मार्ग बदल,
अब कैसे रहूँगा,
जो भीतर ही उमगती है-
सदा ही इतने निकट?!

सत्य की उर्वर ज़मीं पर,
पंक ही फैला हुआ था,
क्या कमल की पंखुड़ी,
बस कल्पना ही मात्र थी?
हे प्रभु! तुम ही कहो ये
क्या नजारा दिख रहा,
स्वीकार कर पाता नहीं,
क्या पूर्व-छवि सब भ्रांत थी?

फिर सोचता,
कहीं कुछ दूरी से झाड़ी
की ओर से देखने में
कहीं तो नहीं हो गया सत्य का क्षरण,
और कुछ भ्रम ही दिखता, हो
सत्य के आभासी आवरण में?!
तो क्यों ना कुछ देर--
बिना भय खाए,
बिना हुए किंचित भी विचलित--
देखूँ निकट से--
इस सत्य को
या कि आभास को!

किंतु, जो लालसा हो पुष्ट--
सत्य देखने की,
तो दृष्य धोखा नहीं देता...!

…सत्य ही थी वो कालिमा,
सत्य ही थी वो गर्जना,
और सत्य ही थी वो दुर्गंध--
जो भीतर नज़र आई थी पहली बार--
और जो भीतर नज़र आई- हर बार!

पूर्व-छवि सब भ्रांत ही थी,
कह रहा सत बारहा,
मान लेने के सिवा अब
कोई भी चारा न था।
पर करूँ क्या जानकर
अब सत्य की उल्टी गति को,
गर्जना गूंजे निरंतर
और सुकूँ पाता न था।

जितना देखता था भीतर-
उतना ही बढ़ता जाता था कोलाहल,
जितना झाँकता था अंतर में-
उतना ही धनीभूत होता था
काम, क्रोध का साम्राज्य,
और जितनी गहरी जाती थी नज़र-
गुम होती थी खुशबुएँ, उतनी ही!

"तुमने तो कहा था, ऐ चाँद
कि भीतर खिले हैं, गुलशन,
सजता है दैवीय संगीत का दरबार
और फैली है स्वर्गीय खुशबुएँ
... हर ओर!"
कहीं कोई गलत मोड़
तो नहीं मुड़ गया,
कहीं चुन तो नहीं ली, कोई उल्टी गली,
या कि किसी पगडंडी पर
बेसुध हो चल पड़ा,
कि मैं यहाँ अकेला-सा ही दिखता हूँ--
ना दिखती है यहाँ
लोगों की अनियंत्रित भीड़,
ना बाज़ार कोई।

"क्या करूँ, किससे कहूँ,
ऐ चाँद अब तू ही बता!"

"देख लो, इससे लड़ो ना,
ये विदा हो जाएगा,
जो करो संघर्ष इससे,
ये प्रखर हो जाएगा।
सत्य है ये, पर नहीं तुम
इसकी छाया भी कहीं,
तुम रहो निरपेक्ष,
साक्षी, मोह ये हट जाएगा।"

कौन निरपेक्ष, कौन साक्षी?
ये कौन है जो विदा हो जाएगा
पर रह जाऊँगा फिर भी, मैं?
तो क्या जो दिखती है ये कालिमा,
ये मैं नहीं हूँ!
क्या नहीं हूँ मैं ये उठती दुर्गंध
और ये चीखता शोर?!
मोह तो आता है नज़र गहन--
स्वयं से और अपनों से,
किंतु ये है कैसा मोह
जो मुझे मोह से भी मोह कराता है?!

साक्षी हो कौन और
निरपेक्ष भाव कौन हो?
ये गली, ये पगडंडिया,
ये मोड़ क्या सब और हैं?
क्या मुझे जो भी नज़र आया,
ना मेरा अंग है?
बुद्धि से मेरे परे इस
कथ्य का गुण-जोड़ है?

चिंतन-मनन, ध्यान-मंथन--
मथता था यही विचार, मस्तिष्क को...!
कठिन था इस कालिमा को ही देखना,
फिर इस मोह, साक्षी का गणित!

कौन है ये, कौन हूँ मैं,
कौन मुझ को कह रहा;
क्रोध ये मेरा नहीं, तो
कौन क्रोध कर रहा?
काम, लोभ, मोह, मद की,
फेरियाँ ना खत्म हों;
सत्य की पगडंडियों के
चक्र में मैं फँस रहा।

संसार के अपने शगल, और
उसमें जीने के तमाम जंजाल तो
पहले ही थे समक्ष,
उस पर अभी उग आया
भीतर दिखता ये काला जगत,
और इस जगत के साथ जुड़ा
तथाकथित मोह!
अपने इस छोटे-से अस्तित्व के साथ
जैसे चलती हो कोई जंग--
हर पल, हर पहर...!

"चाँद ऐ, फिर से पुकारूँ,
तू मुझे अब थाम ले!"
चाँद पिघला और बोला,
"सुन जरा विश्राम से-

“सत्य का पहला चरण,
आरंभ खुद से ही हुआ है,
मन को 'मैं' ही हूँ'- समझना,
भरम गहरे बस गया है।
किंतु जानो-बुद्धि से तुम
देख सकते हो वही,
जो नहीं तुम- दूर तुमसे--
मन तुम्हें तो दिख गया है!

"ध्यान से देखो इन्हें,
ये बादलों से उड़ रहे,
वासना, गुरूर, भय बन
रूप अपने बुन रहे।
तुम तनिक स्थिर ही रहना,
उड़ते जाने दो इन्हें,
हो गए देखो विदा ये,
तुम तो स्थिर ही रहे।

"थे अगर तुम ही वही,
तो क्यूँ न उनके संग उड़े?
क्यूँ नहीं गुस्से में भड़के,
क्यूँ नहीं तुम डर पड़े?
क्यूँ अहं के बादलों से
भीगने से बच गए,
क्यूँ तुम्हारे शांत-चित्त पर
कोई छीटें ना पड़े?!"

बात आती थी समझ।
बुद्धि का कोई हिस्सा
करने लगा था इसे ग्रहण...
कुछ-कुछ... धीरे-धीरे...!
ध्यान में देखने पर दिखते थे विचार--
आते-जाते, उठते-गिरते...
कभी माज़ी,
कभी भविष्य की योजनाएँ बुनते।
करते कोशिश खींचने की-
भय से या ललचाकर ।
कभी भय खाता, कभी ललचाता,
निकल भी लेता था,
साथ इन्हीं बादलों के,
और फिर पाता था,
स्वयं को लिपटा किसी द्वेष,
किसी रोष या किसी लालसा में।

चलता था ये क्रम...
पर कुछ पल रह जाता था स्थिर भी,
और बरस जाता था,
इन्हीं कुछ पलों में
कुछ अनजान-सा-
कुछ यूँ कि जिसमें
कहीं कुछ भीग जाता था -
भीतर... कहीं बहुत भीतर...!

गुम हो जाता अज्ञातों में,
काल-देश के पार कहीं;
अमृत के झरने जैसे
बहते अदृष्य जहानों से।
उन झरनों में नहा-नहा
मैं कैसा निर्मल हो जाता;
लफ़्ज नहीं समझा सकते,
अनुभव को, प्रकट करें कैसे!

इस गुम हो जाने में आकर्षण था,
इस गुम हो जाने में
बार-बार उतरने का दिल करता था।
और बार-बार ये
और विस्तार पाता…!
ध्यान की समय सीमा के आगे भी,
माँग थी इस आनंद में
सराबोर रहने की-- हमेशा
और हमेशा...!
किंतु देह की और जगत की
गति के साथ,
खुली आँखों से-
चलते, दौड़ते, बोलते, पढ़ते
कब सरक जाता इन बादलों के साथ,
कहाँ रहता ये ख़याल!
होश आता तो
अपनी ही बारिशों से भीगी ज़मीन पर,
फिसलकर चोट खाने के बाद!

इस क्रोध-मेघ के पीछे ही,
मैं फिर से दौड़ लगा बैठा,
उसके कटु वचनों से आहत मैं,
फिर से होश गँवा बैठा।
वो छिपी वासना मधु बनकर,
अपनी गोदी में लिपटाती,
गुणगान, प्रशंसा छद्‌म भेष में
अहंकार फुसला बैठा।

ध्यान से उपजी ऊर्जा को
होना था इतना प्रगाढ़
कि बाज़ारों की भीड़ में भी
रह पाता- सजग... सचेत...!
और फिर इतना ही नहीं-
टूटने थे इस दरमियान
बहुत से कठोर पाषाण,
अहंकार के विशाल महल,
और अपने रूप और गुण की
छोटी सी मालूम होती झोपड़ियों
जो वस्तुतः थीं जैसे हिमशैल के शीर्ष।

देखना था- लपलपाता लोभ।
कभी दुबकती, कभी फड़‌फड़ाती
वासना का तिलस्मी खेल,
और भय के काले गहरे कुएँ,
और उन्हे ढाँकने की कोशिश करता
अहंकार और निर्भयता का
थोथा पर कठोर आवरण।

ये टूटना करता था प्रहार,
और दरकती थी देह।
कभी तपती, कभी पिघलती,
कभी हाँफती, कभी थकती,
कभी टूटती, कभी बिखर जाती।
ये जंग थी किसी अलग तल पर,
किंतु प्रभाव था इसका
ठोस...
पूरा...
साक्षात...!

"ऐ चांद! अभी तो आरंभ ही
हुआ है ये खेल,
और दिखता है आगे
कभी ना खत्म होता-सा
एक लंबा मार्ग--
जिस के एक ओर है
अहंकार के विराट पर्वत और
दूसरी ओर वासना की
अनवरत बहती नदियाँ।
मैं निपट अकेला
-चढ़ सकूँगा कैसे,
ये विशाल अट्टालिकाएँ,
और पार कर सकूँगा कैसे,
ये तेज गतिमान नदियाँ?!"

"है तुम्हारा प्रश्न वाजिब,
मैल ये जन्मों पुराने;
जम गए हैं इस कदर,
ताकत तुम्हारी बेअसर है।
किंतु ना समझो अकेला,
खुद से भी ऊपर खुदा है,
कर रहो प्रभु पर समर्पण,
हर कदम उस की नज़र है।

"ज़िंदगी की नज़्म को,
कुछ देर भीतर ही लिखो
कुछ नियम, संकल्प लेकर,
वक़्त अनुशासित करो।
जीविका चलती जहाँ, और
घर तरफ बस चाल हो,
यम, नियम, संयम से उसकी
शक्ति तुम हासिल करो।

"नींद, भोजन, ध्यान का
निश्चित समय, स्थान कर,
काम को देखो सजग हो,
संक्रमण उसका करो।
संपर्क और संचार बस
जितना जरूरी हो रहे,
परमात्मा पर कर भरोसा,
धैर्य धारणा कर चलो।"

अपनी गृहस्थी और
संसार में रहते हुए,
ऐन बाज़ार में चलते हुए
और अपने कार्य-चक्र में जुटते हुए--
साधना था अपना होश,
अथाह विश्वास और धैर्य के साथ।

और साहस...?!
साहस भीड़ में रह कर भी
भीड़ से अलग चलने का।
निंदा और आलोचनाओं,
व्यंग्य और अपमानों को देखते-झेलते,
समझौतों को ठेलते-ठेलते ।

जज़्बा बस चलते ही जाने का...
सब लुटा जाने की हद तक...!
एक-निष्ठ सफर-
सत्य की ही मीन-चक्षु की ओर।

और साथ...?!
साथ उस परमात्मा का--
उसकी विस्तृत ऊर्जा
और अंतर प्रेरणा का--
वो जो बन कर पिता,
डपटता हो, वात्सल्य से;
कभी माँ बन पुचकारता हो, बिठा
अपनी गोद में,
या कि दोस्त बन सुनता हो
दिल का बेसब्र हाल,
या खिलखिलाता हो--
डाल गलबहियाँ...!

चाँद और सूरज की घड़ियों
से मिला अपने कदम,
बढ़ चले विश्वास और
धीरज की अंगुली थामकर।
राह में दिन-रात,
प्रभु की छाँव मे ढलते हुए,
दौड़ते, थमते ज़रा,
फिर चल पड़े विश्राम कर।

रास्ते में, गुनगुनाते-
गुनगुनाते चल पड़े,
किंतु आते मोड़ जिन पर
आँख से आँसू बहे।
फूल ही केवल नहीं थे,
राह में काँटे चुभे,
शक्ति भीतर और बढ़ती,
पीर जितनी ही सहे!

सफर यूँ ही चलता है,
भीड़ में रह कर भी
भीड़ से अलग रहते।
प्रभु की नजदीकियों को
महसूस करते।
भीतरी गर्जनाओं, कालिमाओं
और दुर्गंधों को देखते... गुजरते हुए,
और देखते उन के धुंधलाते
अस्तित्व को-धीरे-धीरे...!

सफर यूँ ही चलता है-
सत्य की झलकियों
और असत्य के भ्रमों के दरमियान
भेद को-
देखते, पहचानते।
स्वयं में सूकूँ के पलों को
जीते और महसूस करते!

सफर यूँ ही चलता है-
विश्वास, धीरज और सुकूँ के
अमृत-वर्तुल में थिरते,
सब ओर उसी के अस्तित्व के
भाव से घिरते,
और अज्ञात की जिज्ञासा के
हर पल, हर रोज़- बढ़ते।

सफ़र तो है, चलते जाने का,
देख गुज़रते दृष्यों को,
दृष्य बदलने की ख्वाहिश ही,
सफ़र बेमज़ा कर देती।
ख्वाहिश की तासीर समझना
और विदा उनका होना,
सफ़र वहीं आनंद बनें,
मंजिल की ज़रूरत क्या रहती!

शुक्रिया ऐ चाँद तू
स्वीकार कर सजदा मेरा,
अपने चेहरे की चमक
मुझ तक भी तूने भेज दी।

"कौन हूँ मैं? क्या है सृष्टि?"
प्रश्न उद्वेलित किए थे,
"क्या यहाँ मेंरा प्रयोजन,
यूँ ही या भटके हुए हैं?
बेरहम इतना ज़माना,
क्या खुदा सच में कहीं है!"
देख भीतर, झलक आई,
सत्य के गुलशन खिले हैं!

१९१००१/१९१००८