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एक अजन्मे को पत्र
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एक अजन्मे को पत्र - अनहद की कलम से

एक अजन्मे को पत्र

“इस पत्र को तुम न समझना मात्र इसके शब्दों से ही…
समझना इसके गूढ़ अर्थ को… !
ये न समझ लेना कि जन्म लेना व्यर्थ है…!
बल्कि जन्मने के पहले,ओ इस धरती पर
जन्मने वाले कोमल शिशु,
याद रखना इन प्रश्नों को, भूल न जाना…
साथ लाना ये गहन जिज्ञासा से भरे प्रश्न…।
क्योंकि यही प्रश्न तुम्हे देंगे वो दैवीय प्यास
जो तुम्हें ले जाएगी उस द्वार तक
जहाँ तक पहुंचने को ही तुम जन्मते हो, बार–बार… !”

नहीं आए दुनिया में तुम, 
दुनिया के बाहर ही अच्छे,
सोचोगे क्या बोल रहा मैं,
किन्तु बोल मन के ये सच्चे।

रो देते ज्यों ही तुम आते,
अश्रु नयन में भर-भर आते,
चीख-चीख कहते जाने दो,
किन्तु विवश स्वयं को पाते।

साँसें लेते, हवा से कहते,
“बतलाओ ये दुनिया क्या है,
तुम्ही मुझे जीवित रखे हो, 
समझाओ ये जीना क्या है?”

हवा बताती, क्या समझाती!
बस कहती “जीते जाओ,
ऐसे ही जीते आई मैं,
तुम भी ना गहरे जाओ।”

प्रश्न पूछते तुम धड़कन से,
“तुम जब तक मैं जीवित प्राण,
पवन मुझे बहलाए रखती,
तुम्ही देओ कुछ मुझको ज्ञान।"

धड़कन तो शर्माए जाती,
बस कहती “इतना जानो,
मैं तो वीणा का स्वर हूँ बस,
मन-वीणा को सब मानो।”

धड़‌कन का स्वामी मस्तक में,
पाता स्वयं, स्वयं के पास,
“कौन बजाता मुझ वीणा को,
हूँ किस वादक का मैं दास?!”

यही प्रश्न दुःख देता रहता,
ना कोई उत्तर में कहता,
खीझ भी जाते, क्रोध में आते,
वादक  पर शून्यांश में रहता।

वादक का तो एक प्रश्न है,
और प्रश्न ना चुप रह जाते,
मन तो जिज्ञासु होता है,
प्रश्न अनगिने दब ना पाते।

प्रश्न उठे, वादक को जान लो,
“वादक का वादक है कौन?”
अंत नहीं पाते जब इसका,
थककर हो जाते तुम मौन।

“कब तक जीना, कैसे जीना,
अगले पल का क्या व्यायाम?”
वर्षों तक सोचा करते तुम,
किन्तु वही स्थिर आयाम।

प्रश्न घुमड़‌ता, मना से कहता,
“क्या क्षण का कुछ निश्चित द्वार?
नहीं व्यवस्थित होता है कुछ,
या होता है सब क्रमवार?”

और सोचते, मन टटोलते,
“कहाँ सृष्टि का पहला काल?
कौन पिता?, तरुवर या बीज था,
कैसी भानु, धरा की चाल?”

क्यूँ आये हो इस धरती पर!
नहीं जान पाते कुछ सार,
व्यथित हृदय हो कहते, “क्यूँ ना,
इतना भी मेरा अधिकार?!”

मृत्यु देख कर यही सोचते,
“कैसा है ये सृष्टि-विधान,
जीवन का उद्देश्य ना समझो,
और ये आ ले जाती प्राण!”

कुछ है जीवन ऐसा लगता,
ब्रह्मांड में चौपड़ चलता,
हम मोहरों को चलता स्वामी,
हार जाए जब मोहरा मरता।

अब तो समझ गए होगे तुम,
कितने मन के बोल थे सच्चे,
नहीं आए दुनिया में तुम,
दुनिया के बाहर ही अच्छे।

९१०८१२/९१०८१४

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