लम्हा लम्हा वक़्त बदलता है,
जीवन अर्थों में साकार-
ठोस, कभी पिघलता-सा
और कभी धुआँ-धुआँ!
छू लेने भर से क्या
समझा जा सकता है
इसके गांभीर्य का वज़न?!
सीढ़ियाँ क्या सिर्फ
ऊपर जाने को ही होती हैं?!
गहरे जाना हो तो
उतरना भी स्वीकार है!
हर ऊंचाई, गहराई से ही उपजती है
हर गहराई, ऊँचाई को जन्म देती है!!
०९०२२७/०२०९२७





