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एक अजन्मे को पत्र
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गीत-गवैया लगता है - अनहद की कलम से

गीत-गवैया लगता है

उसको अपना पूरा जीवन, 
भूल-भुलैया लगता है।
जिन राहों पर वो बढ़ता है,
जिन मोड़ों पर वो मुड़ता है,
अंधे राह-मोड़ वो लगते,
कभी खिवैया लगता है।
उसको अपना पूरा जीवन,
भूल-भुलैया लगता है।

जिन राहों पर चलता आया,
कभी अर्थ उनका लगता,
कभी मगर उद्यम ये सारा,
बेमानी सा लगता है।
कभी यही बेमानी राहें,
फिर कुछ अर्थ दिखा देतीं,
व्यर्थ-सार्थक के वर्तुल में,
विवश घूमता-थिरता है।
उसको अपना पूरा जीवन,
भूल-भुलैया लगता है।

राहों पर जो मील के पत्थर,
सजा-सजा के रख छोड़े,
इच्छाओं का सत्य जान,
हर पत्थर टूटा दिखता है।
किंतु नहीं ये पिंड छोड़ते,
कंकड़ और पाषाण, शिला;
चट्टानों पर खड़ी वासना,
दृष्य सुनहरा लगता है।
उसको अपना पूरा जीवन,
भूल-भुलैया लगता है।

कभी गया वो गहराई में,
कितने पुण्य-प्रसून खिले,
कभी उसी पुलकित-अंतर में,
कण्टक-जाल लिपटता है।
कभी असीम आकाश पुकारे,
दिव्य उड़ानें भर आता,
कभी उसी चमके नभ से
घनघोर अंधेरा झरता है।
उसको अपना पूरा जीवन,
भूल-भुलैया लगता है।

तारों को संकेत समझ जब
लंबी राहें दौड़ चला,
आस, निराशा में बदली,
जो टूटा तारा दिखता है।
बीती राहें भरम दिख रहीं,
चौराहे पर अभी खड़ा,
आगे की राहों को चुनना, रुकना
मुश्किल लगता है।
उसको अपना पूरा जीवन
भूल-भुलैया लगता है।

किंतु किसी को सब दिखता है,
उसका चलना और मुड़ना,
व्यर्थ, सार्थक, चक्र, वासना,
उड़ता कभी सिसकता है।
तारों पर संदेह-भरम से,
चौराहों पर रुक जाना,
दिखता सब उस कृपा दृष्टि को,
'गुरु' ये खूब समझता है-
'कि उसको अपना पूरा जीवन,
भूल-भुलैया लगता है।'

वो चलता है सोच प्रयोजन,
चलना पर चलने खातिर,
चलने में थिर देख सके फिर
चलना, थमता दिखता है।
कभी किसी पल थिर दिखता है,
कभी दिखे चलना उसको,
थिर के पल सब समय समाए,
भूल-भुलैया तिरता है।
भूल-भुलैया-सा जीवन फिर
गीत-गवैया लगता है।

१९१०१७/१९१०१७