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गुफ्तगू - अनहद की कलम से

गुफ्तगू

लिखने का कुछ सलीका-सा नहीं है।
लिखता हूँ बेसाख्ता
अपनी ही किसी रौ में।

कभी तुक में, कभी बेतुका,
कभी लय में, और कभी अनगढ़ा!

बस यूँ हीं बेफ़िक्र, बे-शऊर लिखता हूँ,
बस खुदी से कुछ कहता हूँ,
या कि करता हूँ गुफ्तगू- तुमसे।

१८१००८/१८१००८