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एक अजन्मे को पत्र
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ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी - अनहद की कलम से

ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी

नहीं द्वार पर थाप पड़ी,
आई नहीं पदचाप कहीं;
हौले से दिल में आ बैठा,
ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी।

मित्रवृत्त से तुष्ट हुआ,
नहीं कोई था कष्ट हुआ;
नहीं अधिक मित्रों की चाहत,
तब भी दिल आकृष्ट हुआ।

सावन में ज्यों घास हरी,
बढ़ती, वैसी प्रीत बढ़ी;
साथ समय जो अधिक मिला,
तो प्रीत हो गई और हरी।

पीत सर्व संसार हुआ,
जब वसंत त्योहार हुआ;
गीत गाए मीठी बयार में,
मैत्री का विस्तार हुआ।

जीवन में अनमोल कड़ी,
और जुड़ी, फिर और बढ़ी;
कब अटूट हो गई हृदय को,
ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी।

संघर्षो में साथ हुआ,
नहीं कोई आघात हुआ;
समय बिताया हंसते-हंसते,
कठिन काल आसान हुआ।

पवन-मेघ-सी जोड़ चली,
पानी की लेकर झोली;
जहाँ दिखी बरसात की चाहत,
वहीं लगा ही एक झड़ी।

बोझिल जब संसार हुआ,
चौतरफा अंधकार हुआ;
सुनी मित्र की मीठी वाणी,
हर मुश्किल का द्वार हुआ।

बहुत मित्रता जोर चढ़ी,
सुन्दरतम स्नेह भरी;
लगे स्वर्ग में गढ़ी गई पर,
ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी।

रेखाओं का खेल हुआ,
भाग्य बड़ा बेमेल हुआ;
मेघ, पवन को छोड़ चले
और वेग, पवन का ढेर हुआ।

"पवन बहुत रोए ओ मेघा,
'कहाँ जा रहे छोड़ मुझे,'
विवश मेघ,  जाना मजबूरी,
कहे, 'मेरा भी हृदय बुझे।’


मेघा की मुश्किल वो जाने,
नहीं रोक पाई उसको;
समझ रही जीवन की रीत को,
पर ना पचा पाई  सच को!


विदा घड़ी संताप भरी,
आँख अश्रु से भरी-भरी;
मिलना होगा अब जीवन में,
ज्ञात नहीं कब कौन घड़ी।

९१०८२८/९१०८२८