उस पूनम को मैंने तुम्हे चाँद में देखा।
मैंने देखा कि तुम एक रातरानी से
फुसफुसाते कुछ कहती हो...।
मैं अपने आँगन में पूछता हूँ,
इक गुलाब की पंखुड़ी से,
"जागती हो, अभी सोई नहीं?"
वो मुस्कुराते हुए बोली,
"तुम्हे देख जागती हूँ
हर पूनम की रात;
वो दूर चाँद पर
तुम्हे देखते अपनी प्रिया को...!"
"तुम जानती हो हर पूनम को
मैं उसे देखता हूँ विवश...?
तो क्या तुम ये भी बता सकती हो
कि वो क्या गुनती है भला?"
और ये सुन गुलाब की पंखुड़ी
सफ़ेद हो गई,
और महकने लगी
रातरानी की तरह!
… और मैं भटक गया
उसकी खुशबू से।
वो मुझे फिर चाँद में नहीं दिखती,
और दिखती है आईने में!
कहती मेरी आँखों से फुसफुसाती-सी,
"आखिर हम मिल ही गए...!”
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