बारिश की पहली फुहार से भीगी
माटी की, सौंधी खुशबू हो तुम।
समुंदर की रेत से मिले सीप को
अनायास पा गए बच्चे की आँख की,
मासूम चमक हो तुम।
अमिया के बौर से बौराई
कोयल की पहली कूक हो तुम।
तुम हो उस लोकगीत का सौंधापन,
जो गाया है विहरिणी ने
अपने प्रेम के लिए।
तुम चाँदनी रात की चमक और
अमावस की दिल चीरती खामोशी हो;
और हो उस
रातरानी की सफेद पंखुड़ी,
जिसकी महक में लेता हूँ
आँगन में पड़ी चारपाई पर लेटे!
तुम ज़िंदगी की उदास राहों पर
अचानक आ गए
इंद्रधनुष का बासंती रंग हो!!
तुम मेरे हर ख़ाब की पहली शर्त हो प्रिये!
०९०२२४/०९०२२४





