'हर तरफ बस तुम ही हो’-
मैं इस भाव को घनीभूत करता हूँ।
मैं मानता हूँ अपने आप को
घिरा हुआ, तुमसे ही- सब ओर,
और अपने भीतर भी
इस तुम्हारे ही होने के भाव का
आलिंगन करता हूँ!
मैं बहुत शक्ति से नहीं भींच रहा हूँ तुम्हे....
बल्कि बहुत कोमलता से
खोलता हूँ अपने भीतर की
पंखुड़ियों को...
कि तुम बहुत चुपके से भर आओ
मेरे होने में फूलों की सुगंध की तरह,
और पिघला दो मेरे उस होने को
अपने प्रेम की रहस्यमयी छुअन से...!
मैं अपने धैर्य को सहलाता हूँ।
बहुत प्यार से भिगोता हूँ
उसे विश्वास की ठंडी फुहारों से!
आस के फ़ोहे भर, बनाता हूँ उसे
एक शीतल बिछौना!
जब-तब उछलती व्यग्रता की कूद को
दिखा देता हूँ वही नर्म बिछौना,
और फिर आलिंगन करता हूँ
उसी भाव का कि
हर तरफ बस तुम ही हो...
…बस तुम ही हो...!!
१९०४२७/१९०४२७





