बाहर बारिश, भीतर सूखा,
तृप्त भूख, पर प्यासा भूखा!
पतझड़ की शाखा-सा उजड़ा,
पत्तों को देखूँ बेबस-सा,
गिरते और समाते उर में-
धरती, लाज बचा लो!
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कहाँ हो- मैं ढूँढ़ता हूँ तुम्हें,
कि तुम बताते थे
मेरा खोया हुआ रास्ता।
पर मुझे राह दिखाने वाले
अब तो तुम भी खो गए
इन खो गई राहों के साथ!
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सत्य है-
जीवन कुछ
दिखता-सा तो दिखता है;
सत्य है-
होना, मात्र होने से
कहीं ऊपर है,
सत्य है-
इस होने में
तुम्हारा होना भी है
-ऐसा महसूस-सा होता है!
किंतु ये भी सत्य है कि
संशय हर-पल बढ़ता जाता है-
कि मैं आ रहा हूँ,
इस सब होने के साथ-
तुम्हारे ही पास...!
तुम ही मुझे इंगित करते हो-
ऐसा मुझे लगता है कभी,
पर कभी इसके ठीक विपरीत भी
मुझे भान होता है!
तो फिर मैं संशय से भर उठता हूँ,
कि सच मे आ रहा हूँ तुम्हारे निकट,
या चल रहा हूँ
ठीक विपरीत दिशा की ओर,
और होता जा रहा हूँ
तुमसे दूर- और दूर!
क्या मेरा अहं भाव तुम्हें
इस कदर रोके है,
कि उसे पार कर तुम मुझ तक
पहुँच नहीं पा रहे,
या कि कुछ और कारण है
कि तुम्हारा स्पर्श
मुझे महसूस नहीं होता?
क्या मेरे अहंकार को
मेरा बालपन मान,
अनदेखा नहीं कर सकते?
या नहीं कर पाते साहस
उसको गलाने का,
मेरे टूटने की पीड़ा को याद कर!
या टूटने की पीड़ा के असहनीय
हो जाने के भय से!
क्या कहूँ , क्या करूँ?
हे प्रभु, मदद करो!
२१०९१०/२१०९१०





