तुम्हारी प्रीत में अब और मगन होता रहूँ,
तुम्हारे गीत में उस प्रेम को गुनता रहूँ !
तुम बहते हो देह के
हर कण, हर रोम में प्रभु!
कुछ यूँ करो कि
तुम्हारी भक्ति में और भी रमता रहूँ … !
तुम स्थित हो इस देह के भीतर,
और फैले हो बाहर भी,
अनंत आकाश में!
ध्यान की अवस्था में,
मैं तुम्हे अनुभव करता हूँ
-अपनी समग्र देह में।
तुम दौड़ते हो एक ऊर्जा की तरह,
मुझे तर करते...
किंतु फिर भी मैं देख पाता हूँ कि
तुम्हारा कुछ विशेष है,
जिसे मैं अब भी छू नहीं पाता हूँ...
कुछ है, जिससे
ना मिल पाने से
मैं अतृप्त ही रहता हूँ...!
हे प्रभु! मेरी क्या योग्यता
कि मैं तुम्हारी उपस्थिति को
इंगित कर सकूँ।
मेरी क्या योग्यता,
प्रभु मेरी क्या सामर्थ्य...
कि मैं ध्यान की उस अवस्था में…
तुम्हारी उपस्थिति अनुभव कर सकूँ;
कि मैं तुम्हारी ऊर्जा से तर हो सकूँ!
हे प्रभु! तो कहो भला...
मेरी क्या शक्ति कि मैं उस
अनछुए को छू सकूँ?!
कहो प्रभु...!
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