suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
एक अजन्मे को पत्र
IMG-20250705-WA0011
IMG-20250705-WA0018
IMG-20250705-WA0015
IMG-20250705-WA0013
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
हिय तुमने जब मेरा छीना - अनहद की कलम से

हिय तुमने जब मेरा छीना

हिय तुमने जब मेरा छीना।

पहले-पहल तब,
आँख खोलकर, ज़रा ठहर कर,
दाएँ-बाएँ सिर को घुमाकर…
आँख नचाकर,
समझ रहा मैं…
बदल गया रे मेंरा जीना,
हिय तुमने जब मेरा छीना।

फिरिक चमक मेंरी अँखियों ने देखी।
देखी, देखी, देखी, देखी;
देखी चमक-चम, देखी चमक-चम,
देखी चमक-चम, चम!

फिरिक बिजरिया मेरी बगिया कूदी।
कूदी, कूदी, कूदी, कूदी;
कूदी धमक-धम, कूदी धमक-धम,
कूदी धमक-धम, धम!
चमक-धमक-धम…।

आँख फाड़कर, दौड़-दौड़ कर,
ऊपर-नीचे कूद-फाँद कर,
हाथ हिलाकर,
झूम रहा मैं…
चहक रहा रे मेरा सीना,
हिय तुमने जब मेरा छीना।

प्यास तिहारी मोहे,
जीने की आस बंधाती,
प्यास तिहारी मोहे,
जन्मों की याद दिलाती।

मैं प्यासा, मैं प्यासा,
मैं प्यासा भटकता जाता;
मैं प्यासा, मैं प्यासा...
मेरे प्यास की तड़पन,
जुग-जुग मोहे तड़पाती।

तड़प-तड़प अब,
आँख मूँद कर, साँस थिराकर,
वक्ष-सीस की सीध मिला कर,
भाव सधाकर,
देख रहा मैं...
बरस रहा तू झीना-झीना...
हिय तुमने जब मेरा छीना।

१९०४२९/१९०४३०