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हम तो हैं बंजारे मौला - अनहद की कलम से

हम तो हैं बंजारे मौला

हम तो हैं बंजारे मौला, 
हम तो हैं बे-द्वारे मौला,
हम तो हैं नदिया की चालें,
चल पड़े हरिद्वार मौला।

तन्हा-तन्हा घूमते,
मस्ती, कभी हम झूमते,
सोए रहे अलसाए से,
करते हिमालय पार मौला।

हमने किसका साथ छोड़ा,
हमसफर कब कौन जोड़ा,
हाथ की रेखाएँ सारी,
गंगा-जमुना धार मौला।

ज़िंदगी का सार क्या है,
ये जहाँ, संसार क्या है,
क्यूँ जिया जाता ओ' रामा,
कैसा ये व्यापार मौला।

खोजने निकले शिवाले,
पा गए मदिरा के प्याले,
मिल रहे रस्ते निराले,
ठौर की दरकार मौला।

ध्यान, माला जप रहे,
दिन-रात चलता तप रहे,
ज्यों मोक्ष की तृष्णा बढी,
बढ़ता हृदय का ज्वार मौला।

तू मुझे दरस करा दे
तू मुझे मुझसे मिलवा दे,
तू मुझे घुल जाने दे
तुझसे मिल जाने दे!

मौला, मौला, मौला, मौला, मौला, मौला…
मौला... मौला… मौला… मौला...

२४०५१९/२४०५१९