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इस पथ पर मैं कैसे आया... - अनहद की कलम से

इस पथ पर मैं कैसे आया…

मैं स्वयं आ गया इस पथ पर 
या तुम ही मुझको ले आए?

क्या भूले-भटके मैं आया,
लक्ष्य साध या मार्ग चला?
निकल पड़ा यूँ ही आवारा,
या जीवन से भाग चला?!

क्या जो राह पूर्व में चलता,
वो नीरस-सी जान पड़ी;
या जिज्ञासा अन्य राह की-
इस रस्ते पर आँख पड़ी?

अपनी ही मर्जी मैं आया,
फिर क्यूँ इतना बिलख रहा?
जो चलने का साहस ना था,
आया क्यूँ मैं कदम बढ़ा?

जो तुम ही मुझको ले आए,
फिर क्यूँ राह कठिन लगती?
छिप बैठे हो दूर कहीं,
क्यूँ तुमसे नज़र नहीं मिलती?

२००१०८/२००१०८