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जीना, होना और हारा केंद्र - अनहद की कलम से

जीना, होना और हारा केंद्र

कुछ घुमड़ता-सा, उमड़ता-सा...
व्यक्त होने को बेचैन-सा।
दिल के आस-पास या दिल में ही
कुछ खुलने की चाह में व्याकुल–
व्यग्र-सा।
हारा-केंद्र पर ध्यान
और उस तक पहुंचने की आकुलता?
नहीं… अभी आकुलता तो नहीं
मगर तड़प ज़रूर- कुछ-कुछ…!

दुनियावी हरकतें कुछ खींचतीं,
कुछ भीचतीं...।
ये सब क्या है, जिसमें
उलझ जाता हूँ न चाहते हुए भी?

पर जीने में कहीं तो होगा ही जीना,
और वो ही लगता है उलझना-सा!
पर फिर ख्याल में आता
कि ये तो परिधि है-- 'जीना',
ये तो होने का निष्पादन है।
इसे तो बस होते हुए देखना है।
दूसरों और अपने सापेक्ष के द्वारा
जो भी होता है उसे देखना है बस
जागृत भाव से।

बस यही पुरुषार्थ है–
जागृति...
सतत जागृति--
जागृति, प्रज्ञा के मार्गदर्शन पर,
कि इस 'होने' को देखते वक़्त
जहाँ भी हुए एकसार
वहीं…
बस वहीं अपने को हारा के भाव से
सिंचित करना है…
बस… ये ही ‘करना' का न्यूनतम
और अधिकतम विस्तार है…
शेष सब 'होना' ही है।

जीवन, परिधि पर अपनी गति से
प्रवाहमान है--
संबंधों में नीरसता के बावजूद
कुछ राग है…।
बीते हुए कल में जो
इतनी प्रबलता से होता रहा–
बीते हुए कल में जो आने वाले
कल की, प्रबल भविष्यवाणी
होती रही, वो झूठ की मोटी
परतें ही थी–
कदाचित विश्वास नहीं होता।

किंतु फिर 'होने' के तल पर
वो भी तो 'होना' ही था और
जो अब हो रहा है वो भी
अब का 'होना' ही तो है...
और जो अब के बाद खुलेगा,
वो भी तो 'होना' ही होगा...!

‘हारा' पर ध्यान–
’बस यहीं केंद्र में रहना,
शेष परिधि से विराग–
यही मात्र 'पुरुषार्थ' या
मेरे ‘करने’' की सीमा है।

२५०८११/२५०८११