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एक अजन्मे को पत्र
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जीने की ज़िद - अनहद की कलम से

जीने की ज़िद

मुझे जीने की ज़िद चाहिये।
मैं अस्वीकार करता हूँ
मृत्यु के हर पहर को-
वरण कर उसके ही जीव-स्वरूप को!

मैं असाधारण नहीं,
अति-साधारण होना चाहता हूँ,
कि समा सकूँ गौरेया के
नन्हे-से घोसले में!

पाना चाहता हूँ
नव-जीवन की चहचहाहट में-
जीने की उसी ज़िद को!!

०९०२२७/०९०२२७