उस ऊँचे पहाड़ से गिरती
अविरल जलधारा, 'झरना'-
अपने आगे के रास्ते से
पूर्ण अनभिज्ञ,
बस छोड़ देता है अपने आप को
किसी अनजान शक्ति पर
पूर्ण विश्वास कर!
कब तक, कितनी गहराई तक
उसे गिरते रहना है?
कितने पहाड़ों से हो कर
गुज़रना है उसे?
कभी पहुँचना भी होगा?
होगा कभी छूना उसका
धरती की किसी कोमल सतह को?
या कि कहीं भी रुक जाना होगा उसे--
यकायक ही किसी पहाड़ के
किसी पुराने झरने से बने गहरे कुंड में?
अपने मार्ग और अपने लक्ष्य से
पूर्ण अनभिज्ञ
बस छोड़ देता है
अपने आप को
किसी अनजान शक्ति पर
पूर्ण विश्वास कर।
“तुम भी बन जाओ वही झरना!”
मैं था-- वही झरना,
झरता था किसी अनजान ऊँचाई से
किसी अनजान गहराई की ओर।
अपने मार्ग और अपने लक्ष्य से
पूर्ण अनभिज्ञ,
बस छोड़ दिया था अपने आप को--
या कि छूट ही गया था अपने आप:
और बस झरता था
किसी अनजान ऊंचाई से,
किसी अनजान गहराई की ओर,
मगर बिना ही पूरे विश्वास के।
बिना इस विश्वास के कि
मैं पा जाऊँगा
किसी धरती की कोमल सतह,
और फिर बह जाऊँगा अनवरत
भरे मैदानों के बीच।
और मीलों के अपने सफ़र में
मिल जाऊँगा अपने ही
किसी समंदर से--
सदा के लिए, सदा-सदा के लिए!
मगर कुछ था विश्वास और
उतने ही अविश्वास के मध्य--
तरल-सा विश्वास,
जो मुझे रोकता था रुकने से
किसी पहाड़ के किसी
पुराने झरनों से बने
गहरे कुंड में।
कुछ तो था
जो नहीं रोक पाता था,
मेरे कानो को छूकर निकलती
तट लाँघती आवाज़-
जो आती थी समंदर की लहरों से!
पर फिर भी, कहीं तो था,
एक आवरण-- झीना-सा नहीं,
प्रगाढ़-सा।
कि मन के रंगीन पर्दे पर
उतरती नहीं थी
धरती की कोई कोमल-सी सतह,
या समंदर तक पहुंच पाने का,
कोई विशाल-विराट मैदान!
उस विश्वास और अविश्वास के बीच
कहीं झूलता,
मैं अनवरत झरता था--
किसी अनजान ऊँचाई से,
किसी अनजान गहराई की ओर।
और अचानक उस झरने में
कहीं थाम लिया
उस अधूरे मेरे विश्वास से उपजे
किसी ‘होने’ ने मेरा संपूर्ण अस्तित्व!
और हवा में बहती किसी नाव-सा बन,
फैला दिया मुझे धरती के किसी
कोमल हिस्से पर।
बहुत वक़्त धरती के
उस कोमल हिस्से पर, अचकचाता,
मैं लेटा रहा-- निस्तब्ध!
देखता रहा अपनी दृष्टि पर पड़े उस
प्रगाढ़-से आवरण को उतरते,
और बहते मेरे तरल अस्तित्व में!
विश्वास के अधिअंशों में चढ़कर,
मैं देखता रहा दूर फैले
विस्तृत, और विशाल मैदान के
अधि-क्षेत्र।
बहुत देर मैं खोजता रहा
उस अधूरे विश्वास से उपजे
उस 'होने' को, जिसने थाम लिया था
अनजान ऊंचाई से
अनजान गहराई की ओर झरते
मेरे संपूर्ण अस्तित्व को--
और फैला दिया था
धरती के किसी कोमल हिस्से में।
बहुत देर...
और फिर मैंने खोज लिया वो 'प्रेम'
जिसने थाम लिया था मुझे
मेरे अधूरे विश्वास के बावजूद;
जिसने फैला दिया था मुझे
धरती के किसी कोमल हिस्से में--
मेरे अधूरे अविश्वास को झुठलाकर।
फिर मैं बह चला...
धरती की उस कोमल सतह पर फिसलता।
मैं बह चला।
मैं बह चला,
हवा में बनी उस नाव पर सवार;
अपने अधूरे विश्वास को याद करता,
अपने अधूरे अविश्वास को
ग्लानि-भर भूल जाने की चाह करता--
मैं बह चला!
उस विस्मय से भरता कि
इतना-सा विश्वास भी
ढल सकता है उस 'होने' में;
कि इतना-सा विश्वास भी
बदल सकता है उस 'प्रेम' में।
और अब मैं बहता था-- अनवरत।
ना थी कोई अनजानी ऊंचाई
जहाँ से मै झरता था
किसी अनजानी गहराई की ओर।
और ना था किसी कठोर पहाड़ पर
बन गया कोई गहरा कुंड!
था तो सिर्फ प्रेम--
और उस प्रेम का अविरल बहाव।
उस प्रेम के अविरल बहाव में बहते
कुछ दूर बाद
मैंने जाना:
यह बहाव तो है
धरती के गहराव में।
और उस गहराव में
नहीं थी कोई स्थूल नाव
जिस पर सवार
मैं बह रहा हूँ अनवरत।
बल्कि सिर्फ मैं ही था--
और था मेरे भीतर, मेरे बाहर,
ऊपर और नीचे,
इर्द-गिर्द हर ओर
वही ‘होना', वही ‘प्रेम’।
‘वो बहाव’-
नहीं था प्रेम का अविरल बहाव-
जिसमें मैं बह रहा था,
वरन् मैं ही था वो ‘प्रेम’
जो बह रहा था अनवरत।
मैं ही हो गया था,
विश्वास से भरी प्रेम की वो नदी--
पूर्णभिज्ञ।
वह बढ़ रही थी अनवरत
लहरों की तट-लांघती
आवाज़ की ओर;
भरे मैदानों के बीच
अपने मीलों के सफर तय करती--
मिलने अपने ही किसी
समंदर से,
सदा के लिए,
सदा-सदा के लिए!
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