जितनी जल्दी रात घिरेगी,
शीघ्र भोर भी आ जाएगी;
किंतु रात्रि के विदा समय में,
झिलमिल चादर हट जाएगी।
दुख की गहराई से डरकर,
सतहों को सहलाते रहते,
कुएँ, बावड़ी, नदिया, सागर,
तट, मुँडेर बहलाते रहते।
आनंदों के रतन मिलें,
जब दुख में डुबकी लग जाएगी।
जितनी जल्दी रात घिरेगी,
शीघ्र भोर भी आ जाएगी।
‘कितने डूबे, कभी ना लौटे’--
यूँ ही गणित लगाते रहते।
कितने तर के पार हो गए,
नदिया, सागर बहते-बहते--
पार नदी कर मिलो उन्हे जब,
उनकी गिनती मिल पाएगी।
जितनी जल्दी रात घिरेगी,
शीघ्र भोर भी आ जाएगी।
कभी अमावस के चंदा को,
तुमने गहरी आँख से देखा?
कभी डूबते सूरज के संग,
उसी चाँद को घुलते देखा?
रोज़ साँझ घुलते, धुलते ही,
रात पूर्णिमा हो जाएगी!
जितनी जल्दी रात घिरेगी,
शीघ्र भोर भी आ जाएगी।
२५०८१२/२५०८१२





