"कुछ लिखो तुम।"
"क्या लिखूँ ?
लिखने के जैसे भाव भीतर खो गए।
जग रहा मैं,
पर जगत की चाल-गति में,
भाव भीतर सो गए!
शून्य में खुद को तलाशूँ-
शून्य में ढूढ़ूँ तुझे पर,
शून्य के निर्बंध तल में
भाव भीतर खो गए।"
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उस सत्य को अपने भीतर
समा लेने की चाहत,
और उम्मीद, ना-उम्मीद के बीच
झूलते रहने की तड़प;
'क्या', 'क्यों' और 'किसके लिए' के
अनुत्तरित प्रश्न,
और 'करने' और 'होने’ के बीच
डोलते रहने की विवशता..
-ये सब बहुत पीड़ादायक है!
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मैं भटक रहा हूँ इस राह से उस राह,
उस सत्य की तलाश में,
या कि भटक गया हूँ उस राह में
जो कभी पहुँचती हीं नहीं
उस सत्य के मुहाने तक!
अकेला ही हमराही हूँ अपना,
अकेला ही चलता हूँ थाम अँगुली
-अपनी ही!
ये आँखें और ये पाँव
बस देखते हैं,
और चलते हैं उसी
अँगुली की दिशा में-
कभी विश्वास और
कभी शंका के भावों को साथ लिए!
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झूठ की तमाम परतों के बीच
छिपा सत्य...
ये सत्य है या भ्रम है
सत्य होने का?!
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सब सपना-सा है।
सब शून्य, सुन्न-सा।
मैं यहाँ रहकर भी नहीं हूँ यहाँ,
और कभी हूँ पूरा और पूरा ही यहाँ,
मगर यादों में फिर
आधा-अधूरा, धुंधला-धुँधला-सा!
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क्या करूँ? किससे गुहार लगाऊँ?!
कौन है जो सुन पाएगा
मेरे भीतर की ये पुकार?
"क्या कोई है?!"
मैं ये सब क्या कर रहा हूँ,
क्यों कर रहा हूँ?
भय से या अपनी अपूर्ण इच्छाओं को
पूरा करने के लिए।
अपने कर्मफल के नियोजन के लिए,
या कर रहा हूँ
कि यही है मेरा मार्ग
उन तक पहुँचने का?!
२२१२२३/२२१२१३





