हर लम्हा बस गुजरता है..
और यह देह हो जाती है
उतनी ही पुरानी-
लम्हा-लम्हा!
इसके भीतर ही
छिपा हूँ मैं….!
मगर क्या निकल पाऊँगा इस देह से,
इसके खत्म हो जाने के पहले?
ये कैसी व्यग्रता है!
कौन है इतना आतुर...
और किसके लिए?
ये तड़प, ये बेबसी, ये बेसब्री-
है किसके लिए?!
ये मन-
जो रहना चाहता है सदा
वासनाओं में लिप्त!
ये तन-
जो चलता है यंत्रवत्,
उन्हीं वासनाओं की पूर्ति को!
और वो रूह...
कहते हैं कोई ख्वाहिश नहीं
उसकी कोई!
तो फिर,
कौन है इतना आतुर?!
कोई है जो धुंधलाता है
वासनाएँ मन की-
पर किसके लिए?!
कोई है जो करवाता है तन से
कुछ और ही-
पर किसके लिए?!
और रूह तो खामोश ही बहती है-
पर किस के लिए?!
ये तड़प, ये बेबसी, ये बेसब्री-
है किसके लिए?!
ये कैसी व्यग्रता है?!
कौन है इतना आतुर....
और किसके लिए?!
२००१०८/२००१०८





