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काव्य-श्रवण: एक जीवित अनुभव - अनहद की कलम से

काव्य-श्रवण: एक जीवित अनुभव

वो सुनती रही मेरी एक-एक कविता,
हर एक कविता का एक-एक शब्द।
हर एक शब्द का गहनतम अर्थ,
वो सुन रही थी अंतरतम गहराईयों से!

और उसके मुख से निकले
'वाह' के स्वर ही नहीं बतला रहे थे
उसका इस गहनता से सुनना,
बल्कि उसके मुख का हर इक भाव
दिखलाता था उसके सुनने की
असीम गहराई!

उसकी आँखों का फैलना, सिकुड़ना
और भीग जाना;
उसके होंठों का खिलना, सिमटना,
और नम हो जाना;
उसके गालों का उठना बैठना,
कभी सुर्ख हो जाना;
उस के माथे का निर्द्वंद्ध, सपाट होना
या लहरा जाना।
सब कुछ उसके मुख पर
बारी-बारी से उभरता, बिखरता,
मिट जाता,
और फिर उभरता, बिखरता,
मिट जाता।

मेरी कविता का हर शब्द
जैसे बन गया था एक तूलिका,
और उसका चेहरा एक केनवास,
जो हर शब्द पर बदल देता था
अपना रंग, लकीरें और भंगिमा!

लिखते वक्त हर कविता,
और हर कविता का हर शब्द-
मैने जिया था,
या कि मैं जी रहा था हर शब्द,
और हर कविता,
और उस जिए को ही जीवंत करता था
अपने शब्द, अपनी कविता में।

वो शब्द मृत नहीं थे,
और हर कविता जीवित थी।
हर शब्द था एक लम्हा,
और कविता उन लम्हों की मेंरी ज़िंदगी!

और उस हर कविता...
हर कविता के हर इक शब्द को सुनते
जैसे वो भी जी रही थी,
मेरी उस लम्हा ली गई हर साँस को
और हर कविता में जीवित
मेंरी ज़िंदगी को!

मेरा उन शब्दों, उन क‌विताओं को
लिखते वक्त का जीना,
और उसका उन शब्दों, उन क‌विताओं को
सुनते वक्त का जीना...
-दोनों एक हो गए थे
-दोनों एक हो गए थे!

२५०११०/२५०१११