लंबे-लंबे रस्ते चलते-
कभी घिसटते, कभी उछलते,
कभी कहीं बस थम जाते हम।
ऐसे ही अनगिनत रास्ते,
हमसे होकर निकल गए हैं,
हम भी इनकी सिर रीढ़ों पर,
मचल-मचल कर फिसल गए हैं।
क्या मंज़िल ये ढूंढ रहे हैं,
किस राही को ढूंढ रहे हैं?
हम भी कितनी बार फिसल कर,
जाने कितनी बार संभल कर,
किन राहों को खोज रहे हैं?!
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आगे जीवन कैसा होगा,
इससे तू अनजान रहा,
मगर कहीं तेरे भावों में,
भावी का संज्ञान रहा।
आँखे जैसे सोच रहीं कुछ,
समझ रहीं कुछ होना है,
किंतु नहीं जाने क्या होना,
मेल-बिछड़ना ज्ञान रहा।
२४१०१८/२४१११२





