भीतर कुछ है जो तुमसे कुछ कहना चाहता है…
दिखाना चाहता है तुम्हे तुम्हारा रास्ता…!
उसे सुनो, वो तुम्हें जानता है…
तुम्हारे अंतरतम को भी वो खूब पहचानता है।
उठो, जो ले चले वो तुम्हें ऊंचे पहाड़ों पर,
उतरो, जो डुबो दे वो तुम्हें सागर की गहराइयों में…!
ना डरो, ना घबराओ, बस सुनो उसकी आवाज़ और थमा दो
अपना हाथ उसके हाथों में गहरे विश्वास के साथ…!
वो ’तुम्हारा’ नहीं… ’तुम’ ही है…!
या शांत सगर या क्रूर भँवर में,
कूद पड़ो-
तन में भर-भर,
मन में भर-भरकर,
कूट-कूट कर जीने की अमृत इच्छा को।
कूद पड़ो,
उस पार निकलना हाथ तुम्हारे,
यही सोचकर,
कूद पड़ो
या शांत सगर या क्रूर भँवर में।
हाथों की शक्ति को आँको-
झाँको मन के भीतर और
अंतरतम मन में,
ढूंढ निकालो- छुपे हुए मन के मोती को,
जगा-उठा दो सोए हुए मन के तारो कों,
-झंकृत कर दो...
बजने दो क्या लय ना देखो;
सुर को छोड़ो...
जो सुर हो तुम उसमें बस इक ताल लगाकर,
कूद पड़ो
या शांत सगर या क्रूर भँवर में!
"क्यूँ कूदें?"
-यह प्रश्न निरर्थक तट पर आकर,
यह तो सब पहिले ही तुमने सोच लिया था,
भूल गए अब तट पर आकर,
-तुम घबराकर,
पाँव तुम्हारे कहते हैं-
"चल पलट चलाचल"।
"नहीं जाओ"
तुम वापस जाकर फिर सोचोगे,
फिर आओगे तट तक,
तुम फिर-फिर सोचोगे।
सोच नहीं, तुमको
साहस की तनिक ज़रूरत,
उसको तुम अंतर से पाकर,
कूद पड़ो
या शांत सगर या क्रूर भँवर में।
इन तूफानों को देख बड़ा तुम डर जाते हो,
और प्रतीक्षा करते हो
इनके थमने की,
और थमे कुछ तब कहते हो,
"और थमे कुछ";
इस और-और के थमने में
खुद थम जाते हो।
तूफ़ान बनो-
इन तूफ़ानों को ही डरपा दो,
या फिर इस थमने, बढ़ने को ही झुठला दो,
इसके तूफ़ान तुम्हे जैसे यूँ थमा रहे हैं,
रोक लगा दो इन पर तुम
मन-शंखनाद कर,
कूद पड़ो
या शांत सगर या क्रूर भँवर में।
९२०४१४/९२०४१६





