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एक अजन्मे को पत्र
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कुछ कतरने बिखरीं-सी - अनहद की कलम से

कुछ कतरने बिखरीं-सी

....

शीश पर शिव के सुशोभित,
शशि ही बस शुभ्र है--
मैं निरा बलहीन,
शिवनख की भी स्तुति क्या करूँ!!

२४०२०९

..२..

पंख हैं?
महसूस तो होते नहीं...!

उन उड़ानों को कि जिन का
ज़िक्र तुम करती रहीं हो,
आसमाँ भी, यूं लगे कि जैसे
तुमसे ही सुना है।

तुम उड़े हो या गगन से
यूँ छिपा अपनी उड़ाने,
या तो उड़ने के तुम्हारे
और कोई हैं ठिकाने।

तुम प्रपंचों में तो यूँ पड़ती नहीं,
झूठ-मिथ्या भी तुम्हारे भाष्यकण में,
ऊर्जा पाते नहीं।

फिर भी तुम हर बार कहतीं-
"पंख हैं।"
और मैं भी उतने बार ये ही सोचता-
"पंख है,
फिर वो मुझे महसूस क्यों होते नहीं?"

१८०६१८

....

'कर रहा क्या?'
ये नहीं मुझको पता!
'कर रहा क्यूँ?'
ये भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा।
'कौन है जो कर रहा?'
'कर रहा या हो रहा?'

रास्ते मैं जानता हूँ,
मोड़ भी पहचानता हूँ,
किन्तु ये सब जानना-पहचानना,
भूगोल तक बस-
और ये भूगोल भी तो बाहरी है।

भीतरी भूगोल में तो
रास्ते दिखते नहीं,
रेत की पंगडंडिया,
पदचिन्ह तो टिकते नहीं।

एक मद्दिम रोशनी-सी
टिमटिमाती,
किन्तु क्षण-भर भी नहीं,
आँखों में आती।

एक ज्याति पुञ्ज किंतु
दूसरी-सी ही दिशा से,
यूँ निमंत्रण दे रहा है।
ये निमंत्रण तो नया है।
रास्ता अज्ञात किंतु
पुंज स्थिर तक रहा है।

०६०९१८

..४..

यही फर्क है उनमें और हममें-
उन्हें सिर्फ ७७ ही गलत लगता है,
और हमें- दोनों!

०८०१२०

....

रसहीन कभी लगता जीवन,
रसधार कभी बहती रहती;
मर के उस पार कहीं जीवन,
अमृत के स्त्रोत बहाता है।

३१०३२०

....

पैंतीस से पचपन भए,
भए सैम विद्वान,
अनुभव में चोटी चढ़े,
नहीं दंभ-अभिमान ।
नहीं दंभ-अभिमान,
सरलता पच्चीस जैसी;
जैसा सरल स्वभाव,
सैम की काया वैसी।

२१११२३

....

अनूपजी ने लिखा-

'शोहरत की बुलंदी भी,
पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हैं,
वो टूट भी सकती है।"
-बशीर बद्र

मेरी प्रति-पंक्तियाँ-

“टूटे ये डालियाँ ही,
गिर जाएँ ना दरख्ताँ..."

इनके तो आशियाने,
हैं और भी शहर में;
रह जाएँ बेसहारा,
परिन्दे ना दरख्तों के!

इन सबके करतबों पर,
ताली बजा रहे हैं,
उनके भी आशियाने,
पेड़ों पे ही बने हैं!

ये आज हमको, तुमको
देते हैं गालियाँ जो,
अपनी ही ग़फ़लतों पर,
अफ़सोस फिर करेगें!

२१११२३

....

सोया से ओकारा ज़ीरो,
हो पाए-- कर रहे प्रयास,
निशिकांत तकनीक बताएँ,
वित्त-प्रबंधन करें सुहास!

२२०६२४

..९..

संजय अग्रवाल जी का संदेश-

प्रिय आत्मन,
नमस्कार,
ब्रॉडकास्ट के माध्यम से मेरे संदेश आप को प्राप्त हो रहे हैं। यदि आप चाहते हो कि संदेश आपको ना भेजा जाए तो कृपया सूचित कीजिएगा। आप के प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।
धन्यवाद एवं आभार!"

मेरा प्रत्युत्तर-

"सहज ज्ञान से भरे संदेसे,
अंतर को छू-छू जाते,
संवादों की मधुर श्रृंखला,
प्रतिदिन नवचिंतन पाते।
रखो निरन्तर ब्रॉडकास्ट ये,
दर्शन हम दुर्लभ पाते,
बिन व्यय के अनमोल वचन ये
कहो, कहाँ हम फिर पाते?!"

२७०८२४

....

गिर गया इक फूल, और
खिलने लगीं कलियां नई,
ख्वाब खुशबू बन बहे,
नव रूप पाने के लिए।

और कुछ जो लोग,
जो हमराह हमको मिल गए,
साथ उनके और कुछ,
लंबे सफर हम तय करेंगे।

कई नए किस्से बनेंगे,
कुछ पुराने फिर घटेंगे,
कुछ जो गुजरे रास्ते हैं,
लौट कर उन पर चलेंगे।

हम मिले थे जिस जगह,
अब और आगे हम बढ़ें,
नव-बरस की नई सुबह पर,
आपको वंदन करें।

०१०१२५

....

ना कोई डीपर मीनिंग है,
सब कुछ उथला, सादा है;
गहरे जाने में जोखिम है,
ऊपर मस्ती ज्यादा है!
----------------
पचपन का होने का मतलब,
क्या है? अभी समझते हैं,
सारा जीवन जो भी मिलता,
पचपन में सब करते हैं!

पहले पंद्रह की मस्ती हो,
जोश बाद के थर्टी का,
अनुभव फिर बाकी के दस का,
साफ-साफ कुछ डर्टी-सा!

ऐसे जी लें के जीवन भी
मस्ती मे भरता जाए,
जोश उमंगों और अनुभव के,
गीत साथ हम सब गाएँ!

०९०४२५

...

लिखो कि दिल की खामोश-सी
वो आवाज़--
कलम से कागज़ हो जाए!
भाव जो भीतर ही सरकते हैं--
कहीं गुमसुम से,
दिल के अल्फ़ाज़ बन जाएं!

लिखो कि बन जाए हर लफ्ज़--
पंख परिंदे का,
नज़्म परवाज़ हो जाए;
सिरफ़ स्याही ही नहीं, ऐ दोस्त,
ये कलम,
तेरी आवाज़ हो जाए।

२९०९२५