..१..
वो अमवा का पेड़ औ’ उस पर
इक कोयल का कूकना,
वो गर्मी की शाम औ’ उसमें
पवन का बेसुध घूमना--
ले जाता मेरे चिंतन को,
उड़ा के जीवन के उस पल में,
जिसे मैं फिर से जीना चाहूँ,
चाहूँ, न चाहूँ भूलना।
मैं तब तक था निपट अकेला,
कोई नहीं मेरा साथी था,
तुमको भी तब तक दुनिया में,
मीत एक मिलना बाकी था।
यही वृक्ष था वह अमवा का,
ग्रीष्म साँझ के पवन-झकोर,
कोयल बैठी थी अमवा पर,
पर उसका गाना बाकी था।
निकलीं थी तुम उसी जगह से,
पगडंडी पर जाती थीं,
देख तकूँ मैं तुमको औ’
तुम भी पीछे मुड़ जाती थीं,
आँख-आँख में बात करें,
कोयल ने गाना छेड़ा था,
उस समय तो केवल कूक लगी,
फिर राग समझ में आती थी।
पूछा पहली बार मैंने,
“बन सकता हूँ क्या मीत तेरा?”
नयन में तेरे नीर मुझे
उनमें दिखता प्रतिबिम्ब मेरा।
झुका शर्म से शीष,
कंठ लज्जा से हामी भरता था,
मन उठा खुशी से झूम मेरा,
खिलता-सा था चेहरा तेरा।
साथ तेरे ही बैठ, थीं कितनी
शाम बिताईं इसी जगह,
आती थी तू पास मेरे,
घर पर बतला कर कोई वजह।
बात प्रेम की करें
गीत गाएँ हम प्रेम-पुनीत के,
आए विदा का समयऔर
रोकूँ मैं तुझको किसी तरह।
XX०३९०
..२..
कुछ ऐसा सोच रहा था
कि कभी किसी समंदर के किनारे,
भीगी रेत पर साथ-साथ,
अगल-बगल बैठ कर उन्हे पढ़ेंगे।
पढ़ते-पढ़ते हमारे सिर
हौले-से एक-दूसरे से छू जाएंगे,
और तुम,
खिसक कर थोड़ा पीछे,
अपनी अंगुलियों से, माथे पे आ गई
लटों को हटाते हुए
देखोगी बड़ी मासूमियत से...
देखोगी ना...!
२३०२०९
..३..
ज़िंदगी तेरे सामने
खुली किताब कर सकूँ,
तभी तेरा प्यार कहलाऊँ,
ज़िंदगी, पर जी सकूँ- जो हूँ,
तो ज़िंदा कहलाऊँ!
मुझे ऐ-दोस्त,
मोहलत तो दे चंद लम्हों की,
सच को मैं जान सकूँ और कहूँ--
तो सच्चा कहलाऊँ!!
२२०३०९
..४..
इसमें खुशी भी होती है- दर्द भरी,
और होता है दर्द भी मीठा;
जिसमे रहने में होती है बेचैनी मगर,
जिससे निकलने का दिल नहीं होता!
२१०४०९
..५..
दूरी में इक खूबसूरती है,
दूरी में है इक कशिश!
दूरी में चमक है चाँद की; औ'
सर्दीली दुपहरी में--
सूरज की सुखद तपिश!
२९०४०९
..६..
तेरे होठों की नमी को
महसूस तो कर लेने दे,
तेरी ज़ुल्फ़ की हरकत को ज़रा
जज़्ब तो कर लेने दे।
तू घटाओं का इशारा है
कोई आसमाँ की शरारत तो नहीं,
तेरे तन की फुहारों से,
मुझे तर तो हो लेने दे।
२९०४०९
..७..
मौसम खूबसूरत पर सितारे बड़ी दूर,
चाँद से जलकर भी
आशिक क्या जी पाएगा?!
१६०७०९
..८..
बादलों का ये संदेश है,
"ऐ प्रेम के परिंदो,
निकलो अपने नीड़ से बाहर,
और गुनगुनाओ साथ झूमकर,
प्रेम के मदमस्त भीगते गीत...!"
---------
क्या तुम्हारा प्रेम आतुर नहीं होता,
अपने प्रेमी के साथ
इस भीगते मौसम में,
अठखेलियाँ करने का??
तो आओ, मेघों के इस नाद में
हम भी कुछ गुनगुना लें--
नाच लें पानी की बूंदों के स्वर पर।
मिल जाएँ नभ के माटी से,
एक होने की तरह,
और बिखरा दे हवाओं में,
प्रेम की सौंधी-सी महक!
१५११०९
..९..
अकारण प्रेम जो होता,
वही तो प्रेम होता है,
शेष तो मोह कहलाए,
काम का रूप होता है!
३००७२४





