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क्यूँ सच को तू रहा उतारे! - अनहद की कलम से

क्यूँ सच को तू रहा उतारे!

कल जो नज़र आता था सच, बिलाशक;
आज दिखता है झूठ का बेदर्द चेहरा…!
और कल…?
कल तो तय करेगा वक़्त का हर आता लम्हा…!

वहम, भरम के परदे ढाँप लेते हैं
न जाने कितने ही सच और झूठ…!
कभी सरक जाते हैं कुछ पर्दे वक़्त की तेज़ हवाओं से…
… कुछ मिलने और बातों के कह जाने से कभी…;
कभी रह जाते हैं छिपे वक़्त की धुँधलाती यादों में,
न कह पाने की मजबूरियों में कभी…!

झूठी इक पहचान बताकर, 
आ बैठे तुम घर के द्वारे;
द्वार उलाँघा, बड़ी सफाई,
घूम गए तुम कमरे सारे।
कमरे धूल-रेणु आच्छादित,
अंगुली एक फिराई तुमने,
चीखा, नवअनुभव था, कमरा,
खुशी और उल्लास के मारे।

तनिक बुहारा और, न था
कमरों का कोई ठौर, धूल
उड़ती जाती बाहर, कोष्ठ
आह्लादित थे कुछ और।
बहुत तुम देर समेटे शेष,
बदल डाला कमरों का भेष,
धूल से जो घर था निस्तेज,
चमकता हो जैसे राकेश।

पर घर को बस ये ही दुख था,
क्यूँ सच को तू रहा उतारे;
झूठी इक पहचान बताकर,
आ बैठे तुम घर के द्वारे।

धूल जो, उड़ती थी हल्के,
बैठ जाती तुझ पर चुपके,
तुझे ये भान नहीं होता,
बुहारे तू थी बेधड़के।
लगे कमरे अचरज करने,
कभी डरते, लगते कंपने,
सभी घर सोच नहीं पाता,
ये सच हैं  या केवल सपने।

बना खिलौना, घर अब समझा,
दिया बने तुम, दिए उजारे;
झूठी इक पहचान बताकर,
आ बैठे तुम घर के द्वारे।

गए धूल ले साथ, छोड़
कंटक का लम्बा बाग, कोष्ठ
घायल हो घर निष्प्राण,
सुनाई दे आकुल सी राग,
न जाने गए कहाँ तुम दूर,
हटा दो आकर गढ़ते शूल,
पुराना जीवन दो उपहार,
मुझे पहना दो मेरी धूल।

मन-घर मेरा, कोष्ठ-धड़कने,
सिसकी ले-ले यही पुकारें;
क्यूँ झूठी पहचान बताकर,
आ बैठे तुम घर के द्वारे?

९१११२९/९१११२९