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मैं परमलोभी हूँ रे! - अनहद की कलम से

मैं परमलोभी हूँ रे!

सुधिजन उन सभी को 
बड़ा लोभी कहते हैं,
जो सुस्वादु भोजन
पाने को आतुर हों-
और पाकर आनंदित होते हैं।
अपनी जिंह्वा को तृप्त कर
स्वयं भी तृप्त अनुभव करते हैं।

कुछ मधु का रसपान कर,
अलमस्त होते हैं
और सदैव उसकी कामना में
रत रहते हैं।

उन सभी को भी सुधिजन
लोभी या भोगी कहते हैं,
जो देह के सौंदर्य से
मोहित होते हैं,
और उसके संसर्ग से तृप्त होते हैं।

बहुत-से दुनियावी अलंकारों को
प्राप्त करने की सतत चेष्टा-रत
रहने वाले लोगों को भी सुधिजन
लोभी कहते हैं।

किंतु हे प्रभु,
मैं तो परमलोभी हूँ रे!

मेरा अंतर तो स्वादिष्ट भोजन,
मोहक देह,
या स्वर्णाभूषित अलंकारों से भी
तृप्त नहीं होता!
मेरा लोभ तो तुझे पाने का है-
तुझ विराट को पाने का!

भला मुझसे बड़ा लोभी
और कौन होगा?!

२२०६२७/२२०६२७