सब कुछ श्रेष्ठ प्राप्य है मुझको-
धन, वैभव, संबंधी!
तृप्त-पूर्ण हूँ घर-वाहन से,
हर सुविधा सम्पन्न,
माँ, भार्या, सुत, भाई-बहन से,
तृप्त सभी संबंध।
मित्र वर्ग- मैं भाग्यावान हूँ,
साथ निवासी सत्जन,
कर्मक्षेत्र सहयोगी सब ही;
उत्पीड़न ना बंधन।
पद है, आदर, प्रेम- सभी कुछ,
श्रेष्ठ वंश, कुल, शिक्षा;
तन-मन स्वस्थ्य, ना कोई चिंता,
ना संग्रह की इच्छा...।
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अकारण व्यग्र मैं रहता,
अकारण दुख में डूबा हूँ,
अकारण भय भरा भीतर,
अकारण सब से ऊबा हूँ।
न रस्ता कोई दिखता है,
दिशाएँ ना कोई सजतीं,
जो बाहर दिख रहा सब कुछ,
वो भीतर आँख ना रहती।
कहाँ को पाँव मैं बढ़ दूँ,
कहाँ से पाँव लौटा लूँ,
कहाँ चुपचाप ही बैठूँ,
कहाँ आँखों को झपका लूँ!
मगर बढ़ना तो होता है,
वक़्त का रास्ता अपना,
घूमती ये ज़मीं खुद में,
सूर्य का नाम भी जपना!
समय मन में समाया है,
दूरियाँ मन में बैठी हैं,
ये मन जब तक रहा ज़िंदा,
पीर साँसों में पैठी है।
तो क्या इसका कोई साधन,
कोई बतला न पाएगा,
मौत का वक़्त से रिश्ता,
थिरी आँखों में पाएगा?!
आस्था मिट रही उसकी,
धैर्य भी टूटता जाता,
मगर फिर भी ये अचरज है,
न रस्ता छूटने पाता।
मुकम्मिल लग रहा उसको,
जहाँ में जो जहाँ बैठा,
मगर बैठा ही वो सब क्यूँ,
प्रश्न ये व्यग्र कर देता।
कोई कहता, उसे कह दो-
“समर्पण परम पर कर दो”,
कोई कहता कि भीतर ही,
प्रश्न तूफान बनने दो।
परम से वो बहुत बोला,
मगर आँसू ही बस हासिल,
ध्यान में डूबता गहरा,
ना मिलती थाह, ना साहिल।
तो क्या इसका कोई साधन,
कोई बतला न पाएगा,
मौत का वक़्त से रिश्ता,
थिरी आँखों से पाएगा?!
२३१०३१/२३११११





