suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
एक अजन्मे को पत्र
IMG-20250705-WA0011
IMG-20250705-WA0018
IMG-20250705-WA0015
IMG-20250705-WA0013
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग २ (१९८९) - अनहद की कलम से

मेरे आरंभिक लेखन के पन्ने- भाग २ (१९८९)

१२ अप्रेल १९८९

"स्वयं अति-थी अपने नाम की तरह।"

तूफाँ था वो आया हुआ,
याद करता हूँ आज मैं,
प्रेम किया था मैंने,
जीवन में किसी से।

देखा था मैंने तुमको,
इक रोज़ जहाँ पर,
आता हूँ देख जगह को ही,
इक प्यारी नज़र से।

मालूम नहीं है मुझको,
हो आज कहाँ तुम,
बेचैन कर दिया है मुझे
अपनी याद से।

(इक गलती थी मेरी,
मैंने उसे चाहा नहीं पूजा था।)
-----------------------------------
१० मई १९८९

मुझको अपनी शायरी के,
हर तराने याद हैं;
हैं नहीं वो पास मेंरे,
फिर भी ठिकाने याद हैं।
मिलते हैं हर कोठे पे,
हर कमरे में वो आज़ाद हैं;
महबूब के लब पे हैं, औ’ उसकी
ज़िंदगी का साथ हैं।
चाहूँ उनको जब भी सुन लूँ,
मयखाने जा के पास के,
गुनगुनाते सुन लूँ किसी,
कोयल को जा के बाग में।
----------------------------------
२८ मई १९८९

जश्न मनाता हूँ, तेरे जाने का
कुछ इस तरह,
मुस्कुराता हूँ देख कर,
आईना नम आँखो से।

पाता था जो सुकूँ मैं,
सूरत को देख तेरी,
छीना है तूने ज़ालिम,
मुझ से यूँ दूर जाके।

करते थे इंतजार तेरे आने पे,
हम बरसात का,
खुद-ब-खुद झड़ पड़ी अश्कों की तरह,
तेरे जाने पे!

उस मासूम से बच्चे को नहीं मालूम,
कि उसकी जवानी कब है,
बुढ़ापे के बाद मौत भी आयेगी
ये गुमां ही नहीं।
-------------------------------------
१८ जून १९८९

जीवन के अनमोल रहस्य को,
जान गये पहचान गए,
तुम व्यर्थ न जीवन जीते हो,
यह बात भी मन से मान गए।

अब व्याकुल क्यूँ होते हो,
जब सर्वरहस्य पहचान गए,
अब हंसते गाते जीना है,
जब तक तन-मन में प्राण रहेें।

यह विश्व-रचयिता कोई नहीं,
सब स्वयं स्चयिता भान रहेें,
मानों तो केवल उस माँ को,
और पिता को-- जिनने प्राण दिए।
------------------------------------------
१८ जून १९८९

मन शीतल, जल बहता मानों,
चंद्र किलोलें करता है,
दृष्टि-पटल पर छवि को तेरी,
देख के ही मन भरता है।

देख नहीं पाता मैं जिस दिन,
ये मन क्रन्दन करता है,
चैन नहीं मिलता है इसको,
रुद्र रुदन यह करता है।

"प्रेम किया वर्षों से तुझको,"
कहने से भी डरता है,
इसे भी ना न कह पाये कि
ये तुझमें ही रमता है।

झाँक के देख अरे ओ प्यारी,
देर तनिक अंतरमन में,
किस तरह से व्याकुल हो करके,
दिन रात प्रतीक्षा करता है।