न ‘तुम' हो, न ‘मैं’ हूँ,
हैं तो सिर्फ इस ‘तुम’ और ‘मैं’ के
अदृश्य भाव।
और इन्ही भावों के गुणनफल से
हो जाता है अनंत फैलाव।
इस फैलाव में कई 'तुम' और 'मैं'
मिलते हैं बिछड़ते हैं
और दिखलाई देते हैं स्पष्ट दृश्य से।
पर यकीं जानो-
न ‘तुम' हो, न ‘मैं’ हूँ,
हैं तो मैं सिर्फ इस ‘तुम' और ‘मैं' के
अदृश्य भाव!
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